अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराने के उपरांत अहिल्याबाई होल्कर से मिलने में काशी से एक विद्वान ब्राह्मण आयें। अहिल्याबाई ने उन्हे ससम्मान राजदरबार में बुलवाया।
विद्वान ब्राह्मण के हाथ में रेशमी वस्त्र में एक पुस्तक थी। उन ब्राह्मण ने वह पुस्तक महारानी की ओर बढ़ाते हुये कहा― हे महारानी आपके द्वारा सनातन धर्म के प्रति किये गये कार्यों से प्रभावित होकर मैनें आपके सम्मान में संस्कृत पद्यों से युक्त एक ग्रन्थ की रचना की है, जिसे मैं आपको समर्पित करनें आया हुँ। अहिल्याबाई उदास मन होकर कहने लगी– इन ब्राह्मण को पारितोष के रूप में स्वर्ण मुद्राएं दी जाये।
कोषाध्यक्ष मुद्राओं से भरी थैली लेकर उपस्थित हुआ। महारानी अपने हाथ से स्वर्ण मुद्राएं ब्राह्मण को देने लगी तो ब्राह्मण ने कहा- आप अप्रसन्न मन से मुझे स्वर्ण मुद्राएं दे रही है इसका कारण ?
अहिल्या बाई होल्कर ने कहा- हे ब्राह्मण आप संस्कृत के विद्वान है, ज्ञानी है और काशी में निवास करते है यह प्रसन्नता की बात है लेकिन आपने अपनी विद्वता और ज्ञान का उपयोग इस तुच्छ महिला के महिमामंडन में किया यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। आप अपने इस ज्ञान से अपनी विद्ववत्ता पूर्ण वाणी से भगवान विश्वनाथ की स्तुति करते तो निश्चय ही मुझें प्रसन्नता होती।
ब्राह्मण को बिदा कर अहिल्याबाई होल्कर ने सेवको को बुलाकर कहा कि बडे भारी पत्थर के साथ इस पुस्तक को बांधकर नर्मदा के गहरे जल में इसे डुबा दो।
सेवकों ने ऐसा ही किया।
ऐसी भगवद्भक्ता भगवत परायण सनातन धर्म की सेवा करने वाली अहिल्याबाई होल्कर को कोटि कोटि नमन।