गुरुवार, 25 नवंबर 2021

अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा  काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराने के उपरांत अहिल्याबाई होल्कर से मिलने में काशी से एक विद्वान ब्राह्मण आयें। अहिल्याबाई ने उन्हे ससम्मान राजदरबार में बुलवाया। 
विद्वान ब्राह्मण के हाथ में रेशमी वस्त्र में एक पुस्तक थी। उन ब्राह्मण ने वह पुस्तक महारानी की ओर बढ़ाते हुये कहा― हे महारानी आपके द्वारा सनातन धर्म के प्रति किये गये कार्यों से प्रभावित होकर मैनें आपके सम्मान में संस्कृत पद्यों से युक्त एक ग्रन्थ की रचना की है, जिसे मैं आपको समर्पित करनें आया हुँ। अहिल्याबाई उदास मन  होकर  कहने लगी– इन ब्राह्मण को पारितोष के रूप में स्वर्ण मुद्राएं दी जाये। 
 कोषाध्यक्ष मुद्राओं से भरी थैली लेकर उपस्थित हुआ। महारानी अपने हाथ से स्वर्ण मुद्राएं ब्राह्मण को देने लगी तो ब्राह्मण ने कहा- आप अप्रसन्न मन से मुझे स्वर्ण मुद्राएं दे रही है इसका कारण ?
अहिल्या बाई होल्कर ने कहा- हे ब्राह्मण आप संस्कृत के विद्वान है, ज्ञानी है और काशी में निवास करते है यह प्रसन्नता की बात है  लेकिन आपने अपनी विद्वता और ज्ञान का  उपयोग  इस तुच्छ महिला के महिमामंडन में किया यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। आप अपने इस ज्ञान से अपनी विद्ववत्ता पूर्ण वाणी से भगवान विश्वनाथ की स्तुति करते तो निश्चय ही मुझें प्रसन्नता होती। 
ब्राह्मण को बिदा कर अहिल्याबाई होल्कर ने सेवको को बुलाकर कहा कि बडे भारी पत्थर के साथ इस पुस्तक को बांधकर नर्मदा के गहरे जल में इसे डुबा दो।
सेवकों ने ऐसा ही किया।
ऐसी भगवद्भक्ता भगवत परायण सनातन धर्म की सेवा करने वाली अहिल्याबाई होल्कर को कोटि कोटि नमन।

रविवार, 7 नवंबर 2021

नास्तिक_और_आस्तिक

#नास्तिक_और_आस्तिक
आचार्य रोहित वशिष्ठ
7नवम्बर2021

भारत के मूर्धन्य वैज्ञानिक, नोबेल पुरस्कार विजेता, भारत रत्न  #चंद्रशेखर_वेंकटरामन् अत्यंत व्यस्त होते हुए भी ईश्वर की आराधना और अपने कुल के अनुरूप धर्माचरण में प्रतिदिन कुछ समय अवश्य देते थे ।
एक बार जब वे संध्यावंदन करके उठे तो एक अन्य  भारतीय वैज्ञानिक, जो उनसे मिलने आया था और ईश्वर में विश्वास नहीं रखता था,  कहने लगा – श्रीमान! आप वैज्ञानिक होकर भी ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं , जो विज्ञान से प्रमाणित नहीं हैं। आप प्रतिदिन धर्म-कर्म के लिए आधा घंटा नष्ट कर देते हैं, किस प्रयोजन से?
 वैंकटरामन् ने उत्तर दिया अपना परलोक सुधारने के लिए । मृत्यु के बाद सद्गति हो इसलिए ।
नास्तिक वैज्ञानिक ने बड़ी उपेक्षा से उत्तर दिया कहाँ है परलोक ?  मृत्यु के बाद क्या होगा किसने देखा है ? आपको मालूम है क्या ? ईश्वर कहीं है क्या ? आपने देखा है क्या ?
 
वेंकटरामन् ने  शालीनता से कहा बंधु मैं भी वैज्ञानिक हूं और यह मानता हूं कि न तो ईश्वर को किसी ने देखा है , न हीं इस बात पर मुझे विश्वास है कि परलोक है और मृत्यु के बाद ऐसे धर्म-कर्म से कोई स्वर्ग जा सकता है । 
 मैं मानता हूँ कि सत्यापित किए बिना किसी बात को अंधानुकरण के रूप में नहीं मानना चाहिए ।

अब मैं आपसे पूछता हूँ  कि क्या आपने आपके  विज्ञान ने यह सत्यापित कर दिया है कि  ईश्वर नहीं है ? क्या यह निश्चित कर लिया है कि मृत्यु के बाद यह होगा , और यह नहीं होगा ।

नास्तिक वैज्ञानिक ने उत्तर दिया― यह सभी बातें अनिश्चित हैं । प्रमाणित नहीं । आप भी उन्हें मानने लगे ?  कौन कह सकता है कि ईश्वर है या नहीं ? मृत्यु के बाद क्या होगा ? 

 श्री वेंकटरामन्  जी ने कहा कि ' यह सच है यह बात बिल्कुल अनिश्चित हैकि  ईश्वर का , परलोक का , पुनर्जन्म का , मृत्यु के बाद की गति का कोई अस्तित्व  भी है या नहीं ― यह सब संभावना मात्र हैं ।  हो सकता है कि यह नहीं हों , यह भी हो सकता है कि यह हों । 

यदि यह सब मिथ्या है और नहीं है तो प्रतिदिन मेरा आधा घंटा धर्माचरण में व्यर्थ नष्ट हुआ माना जाएगा ।
कोई बात नहीं कभी-कभी व्यर्थ के काम में भी कुछ समय नष्ट हो जाए तो अनर्थ नहीं हो जाता ।

पर कल्पना करो कि यदि यह सब सत्य हो , वास्तव में हो । तो क्या होगा ? 
 यदि इस संभावना के नाम पर हम अपने आप को किसी दैनिक नियम से बांध लें तो क्या बुरा है ?
 यदि इसके बिना परलोक में दुर्गति की स्थिति हुई तो आपका क्या होगा ?
 उस नास्तिक वैज्ञानिक के पास इसका कोई उत्तर नहीं था । हो भी नहीं सकता ।
वासुदेवकल्याणम्