शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

धृतराष्ट्र का युधिष्ठिर के प्रति वचन

नाहं तथा ह्यर्जुनाद् वासुदेवाद्,
भीमाद् वाहं यमयोर्वा विभेमि।।
यथा राज्ञ क्रोधदीप्तस्य सूत
 मन्ययोरहं भीततरः सदैवः।
महातपा ब्रह्मचर्येण युक्तः
संकल्पोsयं मानसस्तस्य सिद्धयेत्।।
(महाभारत उद्योगपर्व)
संजय! मैं अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन, तथा नकुल-सहदेव से भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोध से तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिर के कोप से । उनके रोष से  मैं सदा ही अत्यंत भयभीत रहता हुँ; क्योंकि वें महान तपस्वी और ब्रह्मचर्य से संपन्न हैं; इसलिए उनके मन में जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
(महाराज धृतराष्ट्र संजय से)

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