भीमाद् वाहं यमयोर्वा विभेमि।।
यथा राज्ञ क्रोधदीप्तस्य सूत
मन्ययोरहं भीततरः सदैवः।
महातपा ब्रह्मचर्येण युक्तः
संकल्पोsयं मानसस्तस्य सिद्धयेत्।।
(महाभारत उद्योगपर्व)
संजय! मैं अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन, तथा नकुल-सहदेव से भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोध से तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिर के कोप से । उनके रोष से मैं सदा ही अत्यंत भयभीत रहता हुँ; क्योंकि वें महान तपस्वी और ब्रह्मचर्य से संपन्न हैं; इसलिए उनके मन में जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
(महाराज धृतराष्ट्र संजय से)
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