सोमवार, 27 सितंबर 2021

श्राद्ध महिमा

सनातन धर्म पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानता है। धर्म ग्रन्थों का सार है जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है और जो मर जाता है उसका जन्म भी अवश्य होता है।  शरीर के नष्ट होने पर आत्मा नष्ट नहीं होता आत्मा अजर, अमर, नित्य और अव्यय है― यह सिद्धांत सनातन धर्म का सिद्धांत है।
 अपने किये शुभ अशुभ कर्मो के फल को जब तक  नही जाता तब तक उसको मुक्ति नहीं मिलती। इसीलिए मुक्ति प्राप्ति के लिए निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए― ऐसा धर्म शास्त्रों ने निश्चित किया है। 
साधना-आराधना करते करते किसी जन्म में मनुष्य को ततो याति परां गतिम्। अर्थात परम गति को पाता है। यदि साधना-आराधना के आभाव में और यह मानव जीवन यूं ही भोग-विलास में यू ही बिता  दिया जाए तो फिर पुनरपि जननं पुनरपि मरणं की श्रंखला में वह  बंधा ही रहता है।
जन्म और मरण स्थूल शरीर का होता है । सूक्ष्म और कारण शरीर में जन्म जन्मांतर के संस्कार संचित रहे हैं। यह  सूक्ष्म और कारण शरीर बड़ा ही विलक्षण है।  परलोक की यातना, नरक की यंत्रणा से न तो यह नष्ट होता है और न ही स्वर्ग के सुख-उपभोग  से विकार को प्राप्त होता है।  यह इतना विलक्षण होता है विशालकाय हाथी जैसे शरीर में तो रहता ही है साथ ही कीटाणु और चीटी जैसे  छोटे शरीर में भी  रह सकता है।
 जब कभी उसे मनुष्य का शरीर मिलता है तभी उसकी मुक्ति की सम्भावना बनती है। इसलिये मनुष्य शरीर को  साधन धाम मोक्ष कर द्वारा  कहकर इसकी महत्ता को प्रतिपादित किया गया है। इस मनुष्य शरीर में ही व्यक्ति साधन के द्वारा अपना कल्याण कर सकता है मनुष्य शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी शरीर के द्वारा जन्म मरण के चक्कर से छूटना अत्यंत कठिन है। ।
धर्म शास्त्रों में परलोक का वर्णन अनेक स्थानों पर किया गया है।
उनमें से एक  कठोपनिषद का वचन है― न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तंवित्तमोहेन मूढ़म। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यतेमे।। 1|2|6
 यम  नचिकेता से कहते हैं कि धन के मोह से मोहित, प्रमादी,  अज्ञानी को परलोक  प्रतिभासित नहीं होता। वह समझता है कि यही लोक है परलोक नहीं है― ऐसा मानने वाला पुरुष बारम्बार मेरे वश को प्राप्त होता है।
इसी परलोक और पूनर्जन्म के सिद्धांत के आधार पर धर्म शास्त्रों में मृतक श्राद्धकर्म  को अनिवार्य  कहा गया है। इस कर्म को  हम आश्विन कृष्ण पक्ष में करते हैं। वह पक्ष  पितृपक्ष कहलाता है।
इस पूरे पक्ष में  नित्य और नैमित्तिक पितरों का श्राद्ध और तर्पण पिंडदान आदि कर्म किया जाता है। उसी श्राद्ध-तर्पण-पिण्डदान का अंग ब्राह्मण-भोजन है।
 इस लोक में अथवा परलोक में और जहाँ कही भी पितरों का निवास होता है― वहीं वेद मंत्रों के द्वारा श्राद्ध-कर्म से पितरों की तृप्ति होती है। इस कर्म को करते समय संशय  नहीं रखना चाहिए। क्योंकि धर्म ग्रन्थों में  अनैक स्थानों पर श्राद्ध कर्म की महिमा वर्णित है।
पितृलोक में किस प्रकार पितरों की प्राप्ति होती है? इस विषय में धर्म शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है हमारे द्वारा प्रदत्त वस्तु किस प्रकार हमारे पितरो तक पहुँचती है उसे हम इस उदाहरण के द्वारा  समझ  सकते है। 
 यदि  अमेरिका आदि देशों में रह रहे किसी  परिचित को  भारत से धनराशि धनराशि भेजनी है तो हम उस धनराशि को बैंक में जमा करके बैक के माध्यम से उस धनराशि को अमुक व्यक्ति तक  भिजवाँ सकते हैं। लेकिन यह बात तो  हम सभी को ज्ञात है कि हमने भले ही भारतीय मुद्रा  में  धन जमा किया हो उस व्यक्ति को वह धन उस देश की मुद्रा के रूप में प्राप्त होगा।  इसी छोटे से उदाहरण से  हम श्रद्धा के विषय को भी समझ सकते है।  ब्राह्मण के माध्यम से एवं वेदमंत्रों के प्रभाव से हमारे द्वारा दिया गया श्राद्धान्न  हमारे पितरों  को इसी प्रकार अन्य लोकों  में प्राप्त हो जाता है। 
पद्म पुराण के सृष्टि खंड के 33वें अध्याय में कथा आती है कि वनवास के समय पुष्कर क्षेत्र में एक बार महाराजा दशरथ के श्राद्ध का समय उपस्थित हुआ। उस दिन बनवासी ब्राह्मणों को भोजन के लिए निमंत्रित किया गया। श्राद्ध के समय जब ब्राह्मण भोजन के लिए आये  तो भोजन करते समय उन्हें देख श्री सीता माता जी छिप  गई। तब भगवान राम ने पूछा कि ― हे सीते! इस समय तुम छिप क्यों गई हो?  तब सीताजी ने कहा कि ― हे राघव ! मैंने भोजन करते हुए ब्राह्मणों के शरीर में आपके पिताजी को देखा है। इसलिये लज्जा   के कारण मै यहाँ से हटकर  छिप गई हुँ।
पिता तव मया दृष्टो ब्राह्मणांगेषु राघव।
दृष्ट्वा त्नपान्विता चाहमपक्रान्ता तवान्तिकात्।।
जिस समय मेरा विवाह हुआ था तब पिताजी ने मुझे सर्वालंकार विभूषित देखा था तब हर्ष से फूले नहीं समाते थे ।अयोध्या से जब मैं वन को चली तो मेरे तपस्विनी वेश को देख कर इतने दुखी हुए थे कि उन्होंने अपना शरीर ही त्याग दिया था। यहाँ  मुझे संदेह हुआ  कि इस समय ऐसी अवस्था में मुझे देखकर कहीं ऐसा न हो कि वह दुखी होकर अपने पितृ शरीर को ही  न छोड़ दे।  दूसरा यह भी है कि इस समय जो भोजन श्राद्ध में था वह ऐसा था जिसे कभी महाराज के सेवकों ने भी नहीं खाया होगा  उसे मैं अपने ससुर को कैसे परोसती?  उन्हें देखकर मैं लज्जा और दुःख  के कारण आपके पास से हट गई।  भला मैं अपने स्वर्गीय महाराज के सामने कैसे खड़ी होती?  यही इसका कारण था। 

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड 102वें अध्याय  में भी श्राद्ध का वर्णन आया है वहाँ  पर लिखा है कि ― श्री रामचंद्र जी ने भाइयों सहित मंदाकिनी के तट से ऊपर आकर पिता को पिंडदान किया। श्री राम जी ने बेर मिले हुए इंगुदी  के फलों का पिंड बनाकर कुशाओं  के ऊपर रखकर अत्यंत दुखी होकर रोते हुए कहा कि ― हे महाराज आजकल हम लोग जो  खाते हैं वहीं इस समय आप भी भोजन कीजिए। क्योंकि मनुष्य जो स्वयं खाता है उसी से वह अपने देवताओं को भी संतुष्ट करता है।  इस प्रकार भगवान राम के द्वारा पिता के श्राद्ध-कर्म का वर्णन है।
 वेद में भी श्राद्धकर्म के विषय म़े लिखा है―
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः।
सर्वांस्तानग्र आवह पितृन् हविषं अत्तये।।
अथर्ववेद 18|2|34
अर्थात जिन पितरों के शरीर पृथ्वी में गाड़े गए हैं या छोड़ दिए गए हैं या अग्नि में जला दिए गए हैं और वे ऊर्ध्व स्वर्गादि  लोगों को चले गए हैं, हे अग्ने! हमारे उन सब पितरों को श्राद्ध के समय भोजन के लिये आवाहन करों। ©आचार्य रोहित वशिष्ठ 9690066000

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