लेखक―वीतरागशिरोमणि, नैष्ठिकब्रह्मचारी, अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ के अध्यक्ष परम पूज्य प्रातःस्मरणीय गुरूदेव समर्थश्री स्वामी श्री त्रयंबकेश्वर चैतन्य जी महाराज
शिक्षा प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, सीखने वाला चाहिये।
निरन्तर होता परिवर्तन हमें संसार की नश्वरता का बोध कराता है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई, तुलसीदास, रैदास, कबीर, सूरदास, नरसी आदि का चरित्र देखकर, सुनकर हमें चाहिए की बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों का अनुसरण करें। कसंग को छोड़कर सत्संग करें। अन्याय-अनीति को छोड़कर न्याय-रीति से चलें। अन्याय-अनीति का प्रतिकार करें, चुप न बैठें। कहते हैं अन्याय करना पाप है तो अन्याय सहना महापाप है, परंतु अन्याय होते देखकर चुप रह जाना, उसका विरोध ना करना घोरातिघोर महापाप है।
आपको अपने मन की बात बताते हैं― जब हम छोटे थे, घर वालों के साथ रामलीला देखने गये। रामलीला में श्री विश्वामित्र जी महाराज के साथ श्री राम-लक्ष्मण को देखा बस मन अटक गया। उनके वस्त्रों को, बोलने के ढंग को देखते ही मन में भाव जगा कि हमको भी ऐसा ही बनना है। यह तो पता नहीं कि उनके जैसे बने या कि नहीं बने परंतु वेशभूषा एवं जीने का ढंग उनके जैसा हो ही गया। सत्य तो यह है कि इंसान जैसा होना चाहता है एक-ना-एक दिन वैसा हो ही जाता है। यह व्यक्ति की तत्परता और लगन पर निर्भर करता है कि ये सफर कितना शीघ्र पूर्ण होगा और कितनी देर लगेगी।
संभवतः हम सप्तमी कक्षा में पढ़ते थे वहाँ हमारे एक अध्यापक थे जिनकी शालीनता, योग्यता तथा व्यवहारोन्मुख सहयोगात्मक प्रवृत्ति के कारण उनका बहुत सम्मान होता था। एक दिन में छुट्टी के उपरांत विद्यालय से अपने घर जा रहे थे, रास्ते में एक सम्भ्रान्त घर का प्रोढ़ व्यक्ति मदिरा के नशे में बेहोश होकर नाली में पड़ा था। उसके शरीर को कुत्ते काट रहे थे। हमने भी वह दृश्य देखा और कुछ हँसी, कुछ घृणा, कुछ निन्दा का भाव जगा। समाधान कुछ हुआ नहीं। दिन गुजरा, रात बीती, अगले दिन विद्यालय गए उन्ही गुरुजी का कालांश (पीरियड) आया। उन्होंने दो शब्द प्रयोग किये, वे शब्द आज भी उनकी उसी गम्भीरता और प्रेमरस से सराबोर ध्वनि में हृदय में संरक्षित हैं। उन्होंने कहा था बच्चों! हमें शिक्षा दो प्रकार से मिलती है
1. अच्छे इंसान के अच्छे कर्म से, 2. बुरे आदमी के बुरे कर्म से ।
पहली बात तो समझ में आ ही जाती है, परंतु दूसरी बात समझ में नहीं आती। भाई बुरा इंसान क्या शिक्षा देगा? उससे क्या सीखे? बड़ा सीधा साधा सा ढंग उन्होंने बताया कि अच्छा इन्सान कुछ अच्छा कर्म करें तो हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम भी ऐसा ही अच्छे कर्म करें। जब बुरा इन्सान कोई समाजविरोधी अनैतिक कार्य करें तो उसे देखकर घृणा न करो, निन्दा न करों, उपहास मत उड़ाओ, अपितु उसको भी गुरु मानकर शिक्षा लो कि हम जीवन में ऐसा कार्य कदापि नहीं करेंगे। बुरे इंसान से घृणा नहीं बल्कि बुराई से घृणा करो। जीवन में विविध रंग, विविध ढंग, विविध संग, विविध जंग के पल आते हैं, समझदार वही है, जो संतुलन बनाए रखता है। राग-द्वेष में, मित्र-शत्रु, में, लाभ-हानि में, जय-पराजय में, जन्म-मरण के संदेश में, सुख-दुःख में, सर्दी-गर्मी में, अनुकूलता-प्रतिकूलता में, यश-अपयश, में भवन-वन में, सुस्वादु-नीरस भोजन में ― कहाँ तक कहे, जीवन के प्रत्येक कदम पर संतुलन अपेक्षित है। संतुलन शब्द बहुत छोटा है, परंतु किसी एक शब्द से समग्र शास्त्रों का नैतिक तत्व, जीवन जीने की कला, जीवन-दर्शन भरा हुआ है। जिसने सन्तुलन बना लिया, उसने जीवन बना लिया। किसी भी स्थिति में वह प्रौढ़ व्यक्ति बिखरता नहीं, तमाशा नहीं बनता।
हम लोग अपने जीवन का बेशकीमती समय व्यर्थ की चर्चा, व्यर्थ की चिन्ता, व्यर्थ के विवादों में गवाँ देते है, जबकि हमको आत्मचिन्तन करके अपनी स्थिति का आंकलन करना चाहिए कि मैं क्या हूँ? मेरी अच्छाई-बुराई क्या है? मेरी शक्ति तथा मेरी कमजोरी क्या है? तदनन्तर उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए, जिससे कि हमें सफलताओं की प्राप्ति में सहजता हो। जब जीवन सुनियोजित हो तब सफलताओं की संभावनाएं बढ़ जाती है। हमको लगता है कि जगत् में जो कुछ भी है, अच्छा या बुरा सबसे कुछ-न-कुछ सीखा जा सकता है। आप सोचो! क्या व्यभिचार-परायणा सवेच्छाचारिणी कोई वेश्या भी कुछ शिक्षा दे सकती है? नहीं न! क्योंकि उसकी शिक्षा, उसके संस्कार, उसकी संगति तो हमको पतन की ओर ले जा सकती है, दुश्चरित्रता के दलदल में फंसा सकती है, यही बात है न ! परंतु भारतीय ऋषि-परम्परा के देदीप्यमान नक्षत्र, अद्वैतनिष्ठा के प्रतिमान, साधुता की कसौटी, परमानंद की मस्ती के समुद्र में सदा निमग्न रहने वाले अत्रिनंदन दत्तात्रेय जी महाराज ने अपने जीवन में 24 गुरुओं की चर्चा की है। आश्चर्य यह है कि ना तो उन्होंने किसी गुरु से दीक्षा ली और ना ही किसी गुरु को दक्षिणा दी। दीक्षा और दक्षिणा की व्यवहारिक ओपचारिकताओं से रहित होकर उन 24 गुरुओं से शिक्षा भी ली, उनको गुरू भी माना, परन्तु उन गुरुओं खबर तक नहीं।
(हम गुरुओं की नजर में आना चाहते है, उनकी लिस्ट में नाम चाहते हैं, परंतु उनकी शिक्षाओं पर नहीं चलते, यही विडंबना है)
दत्तात्रेय जी ने कहा कि मैं एक बार भ्रमण करता हुआ मिथिला पहुंच गया, रात्रि के समय बाजार में एक स्थान पर विश्राम हेतु बैठ गया। सारी दुनियां चैन की नींद सो रही थी। वहीं पर एक सुंदर से भवन में श्रृंगार करके एक सुंदरी आने-जाने वालों को देखती, बार-बार अंदर जाती, बाहर आती। बेचैनी में जागते हुये पूरी रात गुजर गई, परंतु कोई ग्राहक नहीं आया । मैंने पता किया तो जाना कि यह सर्वोत्तमा सुंदरी मिथिला की वेश्या पिंगला है। प्रातःकाल 4 बजे मंदिरों की घंटियां बज उठी। शंख की मांगलिक ध्वनि से दिशाएँ गूँजने लगी। मंत्रोच्चारण तथा प्रार्थनाओं के प्यारे स्वर हवा के साथ तैरते हुए दूर तक अठखेलियाँ करने लगे और उधर पिंगला ने श्रृंगार फेंक दिया, बेचैनी और निराशा की जगह मुखमण्डल पर प्रसन्नतामिश्रित सोम्यता, निश्चिन्तता, शांति की प्रभा ने अड्डा जमा लिया। सहसा पिंगला बोल उठी―छिः-छिः, मेरा सारा जीवन नश्वर संसार के, नश्वर भोगों की पूर्ति के लिए, नश्वर प्राणियों की ओर आशा भरी नजरों से निहारते बीत गया। मैंने कभी अपने अंतर्मन में बैठे प्राणधन प्रियतम की ओर देखा तक नहीं। हे अभागिन पिंगले! तू जाग जा, वासना की गंदी नाली को छोड़ उपासना की गंगा में अवगाहन कर । अब लौं नसानी अब ना नैसेहौं ― अब तक जीवन व्यर्थ गया, अब एक पल भी व्यर्थ नहीं करना। संसार की आशा दुख देती है और संसार से निराश होने में ही सुख है।
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
पिंगला वेश्या की इस बात को सुनकर दत्तात्रेय जी ने पिंगला को मन ही मन नमन करके गुरु मान लिया और मन में ठान लिया कि अब किसी से आशा या अपेक्षा नहीं करना, क्योंकि अपेक्षा ही उपेक्षा कराती है। आप किसी से अपेक्षा ना करो तो कोई उपेक्षा कर ही नहीं सकता। सन्त ने वेश्य से भी कुछ सीख लिया और एक हम हैं कि सन्तों से भी कुछ सीखने को तैयार नहीं।
पूरा जगत हमारा गुरू है, हमें सावधानी पूर्वक अच्छाई-बुराई का निर्धारण करके जीवन पावन बनाना है।
साभार―गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के जून 2021 के अंक से
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