छाया पति की बन जाती है;
अपनी कोमल उंगलियों को
रथ चक्के की कील बनाती है;
काली-सी मतवाली बनकर
अरिदल का रक्त बहाती है;
अन्यायी आताताइयों की
दल देती पल में छाती है;
स्वागत करती बाणों, प्राणों से
बरछी और कटारी का
है कितना गौरवशाली पद
वसुधा में हिंदू नारी का ।। 1 ।।
जिसके उज्जवल तप के आगे
झुक जाया करता इंद्रासन,
लख जिसका अनुपम शौर्य
डगमगाने लगते हैं सिंहासन;
पृथ्वी पर गिरते राजमुकुट
लख करके जिसका वीरासन,
है मिट जाता वसुधापरसे
अन्यायी क्रूर कुटिल शासन;
थक जाता दस सहस्र गज बल,
पर अन्त न मिलता सारी का।
है कितना गौरवशाली पद
पाताल-लोक भूगोल तथा वह—
स्वर्गलोक जल जाता है,
क्रोधानल से जिसके क्षण में
रबि-शशि-मंडल झुलसाता है;
तारक, विद्युत, बादल का क्या—
कहना जब नभ थर्राता है;
सागर गिरि सरिता मरू—
समीर का चिह्न ना रहने पाता है;
जिसके चरणों पर झुका शीश
यमपुर के भी अधिकारी का।
है कितना गौरवशाली पद
रण में जाकर डट गई कभी
अरिदल को मार भगाने को,
चंडी का प्रबल प्रचण्ड तेज
दुनिया को याद दिलाने को;
या झटपट उद्यत हुई स्वयं ही
अनल ज्वाल धधकाने को
लपटों में जा छिप गई कभी
जो अपना धर्म बचाने को;
इसके ही कारण मान बढ़ा
जोहर-व्रत की चिंगारी का।
है कितना गौरवशाली पद
बसुधा में हिंदू-नारी का ।।4।।
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