युधिष्ठिर धर्मराज क्यो?
आचार्य रोहित वशिष्ठ
महाराजा युधिष्ठिर धर्मावतार थे उनके समान धर्मज्ञ होना कठिन है तो भी वे अपने कुल के वयोवृद्ध भीष्मपितामह से धर्म विषयक चर्चा करते है और उनके वचनों को श्रद्धा पूर्वक सुनते है। उनके विषय में कहा गया वचन सत्य है युधिष्ठिर का स्मरण करने वाले मनुष्य का धर्म बढता है।
महाभारत के वनपर्व में महाराज युधिष्ठिर कहते है:- मैं कर्मों के फल की इच्छा रख कर उनका अनुष्ठान नहीं करता अपितु देना कर्तव्य है यह समझकर दान देता हुँ और यज्ञ को भी कर्तव्य मानकर ही उसका अनुष्ठान करता हुँ।
उस कर्म का फल हो या ना हो गृहस्थ आश्रम में रहने वाले पुरुष का जो कर्तव्य है उसी का यथाशक्ति कर्तव्य बुद्धि से पालन करता हुँ।
मैं धर्म का फल पाने के लोभ से धर्म का आचरण नहीं करता, अपितु साधु पुरुषों के आचार व्यवहार को देखकर शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन न करके स्वभाव से ही मेरा मन धर्म पालन में लगा है। जो मनुष्य कुछ पाने की इच्छा से धर्म का व्यापार करता है वह धर्मवादी पुरुषों की दृष्टि में हीन और निंदनीय है।
जो पापात्मा मनुष्य नास्तिकतावश, धर्म का अनुष्ठान करके उसके विषय में शंका करता है अथवा धर्म को दुहना चाहता है अर्थात धर्म के नाम पर स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है, उसे धर्म का फल बिल्कुल नहीं मिलता।
मैं सारे प्रमाणों से ऊपर उठकर केवल शास्त्र के आधार पर यह जोर देकर कह रहा हुँ कि तुम धर्म के विषय में शंका ने करो; क्योंकि धर्म पर संदेह करने वाला मानव पशु पक्षियों की योनि में जन्म लेता है।
जो धर्म के विषय में सन्देह रखता है, अथवा जो दुर्बलात्मा पुरुष वेदादि शास्त्रों पर अविश्वास करता है वह जन्म मृत्यु रहित परमधाम से उसी प्रकार वंचित रहता है जैसे शुद्र वेदों के अध्ययन से।
धर्म के विषय में संशय रखने वाला बालबुद्धि मानव जिन्हे धर्म के तत्व का निश्चय हो गया है, उन समस्त ज्ञानीजनों को उन्मत्त समझता है; अतः वह बालबुद्धि दूसरे किसी से कोई शास्त्र प्रमाण ग्रहण नहीं करता।
केवल अपनी बुद्धि को ही प्रमाण मानने वाला उद्दंड मानव श्रेष्ठ पुरुषों एवं उत्तम धर्म की अवहेलना करता है; क्योंकि वह मूढ इंद्रियों की आसक्ति से संबंध रखने वाले इस लोक-प्रत्यक्ष दृश्य जगत की सत्ता ही स्वीकार करता है। अप्रत्यक्ष वस्तु के विषय में उसकी बुद्धि मोह में पड़ जाती है।
जो धर्म के प्रति संदेह करता है उसकी शुद्धि के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। वह धर्म विरोधी चिंतन करने वाला दीन पापात्मा पुरुष उत्तम लोकों को नहीं पाता अर्थात अधोगति को प्राप्त होता है।
जो मूर्ख प्रमाणों की ओर से मुंह मोड़ लेता है, वेद और शास्त्रों के सिद्धांतों की निंदा करता है तथा काम एवं लोग के अत्यंत परायण है, वह नरक में पड़ता है।
जो सदा धर्म के विषय में पूर्ण निश्चय रखने वाला है और सभी प्रकार की आशंकाएँ छोड़कर धर्म की ही शरण लेता है वह परलोक में अक्षय अनंत सुख का भागी होता है।
धर्म कभी निष्फल नहीं होता। अधर्म भी अपना फल दिए बिना नहीं रहता ।
धर्म का फल तुरंत दिखाई नहीं दे तो इसके कारण धर्म एवं देवताओं पर शंका नहीं करनी चाहिए ।
दोषदृष्टि न रखते हुए यत्नपूर्वक यज्ञ और दान करते रहना चाहियें।
कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है यह धर्म शास्त्र का विधान है।
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