सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?

वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?
आचार्य रोहित वशिष्ठ
10अक्टूबर 2021
वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?
अपने मत से पूर्व हमें  शास्त्रमत का अवलोकन अरना आवश्यक है।
इस विषय में धर्मशास्त्र का क्या मत है आईये जानते है।इस लेख के माध्यम से
कुछ आधुनिक हिंदुओं का कहना है कि " वर्ण व्यवस्था तो हम मानते हैं; क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने भी कहा है कि चतुर्वर्ण की सृष्टि मैंने की है। पर चतुर्वर्ण से भगवान का अभिप्राय जन्मना जाति मानने वाली व वर्तमान व्यवस्था नहीं है,  किंतु वह व्यवस्था है जिसमें मनुष्य के गुण व कर्म के अनुसार उसका वर्ण निश्चित होता है।
भगवान ने स्पष्ट ही गुणकर्मविभागशः कहा है " ।
अतः इन लोगों का मत है कि जन्मना जाति मानने वाली वर्तमान पद्धति को हटा देना चाहिए और वही प्राचीन व्यवस्था जिसका निर्देश भगवान ने किया है  अर्थात मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसके अनुसार उसका वर्ण निश्चित करने वाली व्यवस्था फिर से स्थापित करनी चाहिए। तभी हमारे समाज के अंदर सच्चे और अच्छे लोग ब्राह्मण कहलाएंगे और ऐसी वर्ण व्यवस्था से समाज का कल्याण  होगा । वर्तमान व्यवस्था में केवल ब्राह्मण कुल में जन्म हो जाने से ही ऐसे-ऐसे लोग ब्राह्मण कहलाते हैं जिनमें जरा भी योग्यता नहीं है। इससे बहुत बड़ी हानि हुई है।  हम लोगों का राजनीतिक दासत्व इसी का परिणाम है।  इसी से सब बुराइयां उत्पन्न हुई है। जिससे हिंदू समाज त्रस्त है।

इस लेख को पढने से  निश्चय ही यह समझ में आ जाएगा कि भगवान श्रीकृष्ण या श्रीमद्भगवतगीता का यह अभिप्राय नहीं है कि किसी मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसका वर्ण निश्चित किया जाए;   बल्कि उन्हें यही बतलाना है कि किसी की  जाति उसके जन्म से ही जाननी चाहिए। जन्मना जाति की व्यवस्था पर जो अन्य आक्षेप किये जाते हैं,  वे किस प्रकार निराधार हैं।

1. यदि किसी मनुष्य की जाति उसकी वृत्ति या  कर्म पर निर्भर होती तो द्रोणाचार्य क्षत्रिय कहलाते ब्राह्मण नहीं क्योंकि उनका व्यवसाय युद्ध करना था। 
पर जन्म के कारण ही वह ब्राह्मण थे।

2. उनके श्यालक (पत्नी के भाई)  कृपाचार्य योद्धा होने पर भी ब्राह्मण थे क्योंकि ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ था।

3.  अश्वत्थामा में ब्राह्मण के न तो कोई गुण थे उनके कर्म ही ब्राह्मण के अनुकूल थे। वे तो  इतने क्रूर थे कि रात में पांडवों के शिविर में घुसकर सोते हुए द्रोपती के बच्चों का उन्होंने कत्ल कर डाला।  उत्तरा के गर्भस्थ बालक पर भी उन्होंने अति भयंकर बाण चलाया । फिर जब फिर भी जब भी पकड़े जाते हैं तब यही निश्चित किया गया है अश्वत्थामा का वध नहीं हो सकता; कारण भी बताया कि अश्वत्थामा जन्मना  ब्राह्मण है।  इसलिये अपराधी होते हुये भी उन्हे प्राण दण्ड न देकर सिर-मूँछ मुडाकर देश निकाला दे दिया गया ।
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद् गौरवेन च।।
महाभारत सौप्तिक पर्व 16|32

गुण कर्म के अनुसार किसी मनुष्य का वर्ण निश्चित करने में एक बहुत बड़ी बाधा है।
 प्रायः ऐसा देखने में आता है कि किसी मनुष्य के गुण तो उसे एक वर्ण का बतलाते हैं पर उसका कर्म दूसरे ही वर्ण का होता है ऐसी अवस्था में उसका वर्ण कैसे निश्चित किया जाएगा। फिर किसी मनुष्य के गुणों की पहचान करना भी बहुत कठिन है। बाह्य स्वरूप से गुणों का ठीक ठीक पता नहीं चलता अक्सर धोखा हो जाता है। ऐसा हो सकता है कि बाहर से देखने में कोई मनुष्य बहुत उग्र और रुखा हो पर उसका हृदय अत्यंत कोमल और उदार हो । ऐसा भी हो सकता है कि कौई व्यक्ति  वाणी बहुत मधुर हो पर हृदय से अत्यंत कठोर ।  एक ही मनुष्य में गुण-दोष के अवलोकन करने  में मतभेद भी हो सकता है उस व्यक्ति के मित्र कहेंगे कि अमुक व्यक्ति अत्यंत सज्जन है शत्रु कहेंगे वह महादुर्जन है। चलो यह भी मान लिया जाए कि गुणों का पता लोग परख ही लेगें तो भी इस बात क्या भरोसा कि उसके वे गुण उस व्यक्ति में आजीवन बने रहें। अक्सर देखने में आता है सज्जन व्यक्ति में दुर्जनता का भाव  उत्पन्न हो जाता है और  दुर्जन व्यक्ति को  सज्जन बनते देर न लगती। ऐसी स्थिति में  गुण और कर्म से जाति का निर्धारण कैसे हो सकता है।

कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में अर्जुन ने कहा मैं युद्ध नहीं करूंगा भिक्षा मांगकर जी लूंगा।  यदि गुण और कर्म से ही जाति निश्चित हो जाती तो फिर भगवान श्री कृष्ण को गीता का उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ती।  अर्जुन में ब्राह्मणों के वे सभी गुण थे जिसका गीता जी में उल्लेख किया गया है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।
शम, दम, तप, शुचिता, क्षमा, आर्जव, ज्ञान-विज्ञान आस्तिकता   ये  सब ब्राह्मणों के स्वाभाविक गुण है। भिक्षावृत्ति ब्राह्मण की है।
गुणकर्म के अनुसार अर्जुन को ब्राह्मण ही होना चाहिये फिर युद्ध न करने से उसे कौन सा पाप लगता ।
लेकिन भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि यदि तुम युद्ध नहीं करोगे तो तुम्हें पाप लगेगा।
 श्रीकृष्ण का ऐसा कहना तो तभी युक्तिसंगत हो सकता है जब जन्मना जाति मानने की ही व्यवस्था हो क्योंकि अर्जुन जन्म से क्षत्रिय है।  क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना यदि अर्जुन युद्ध नहीं करता तो वह अपने धर्म की अवहेलना करता है और पाप का भागी होता है।
जब जन्मजात वर्ण से कर्म और धर्म निश्चित होता है तभी कोई मनुष्य जो चाहे वह कर्म नहीं कर सकता ।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र ही प्रमाण हैं। 
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

शास्त्रों में सबसे पहले वेद है। ये ही सब शास्त्रों के आधार हैं।  ऋग्वेद संहिता के 10|90 (पुरुष सूक्त) में तथा तैत्तिरीय संहिता के 7|1|1 में बताया गया है कि चार वर्ण प्रजापति ब्रह्मा के चार  अंगों से उत्पन्न हुए हैं। 
छान्दोग्योपनिषद के 5|10|7 में यह वर्णन है कि जो लोग पुण्य कर्म करते हैं,  वे  दूसरे जन्म में ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य  कुल में जन्म लेते हैं और जो पाप कर्म करते हैं में चांडाल आदि योनियों में प्राप्त होते हैं। 
रमणीय चरणा रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मण योनिं वा क्षत्रिय योनिं वा वैश्ययोनिं वा। कपूय चरणाः कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डाल योनिं वा।

मनुस्मृति का वचन है
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु ।
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त एव हि।।
मनु.10|5 
सब वर्णो की अक्षत-योनि तुल्य पत्नियों में गर्भाधान करने से जो संतान हो, उन्हे अनुलोम क्रम से उन्ही वर्णों की जानना चाहिये।ब्राह्मण पतिपत्नी से उत्पन्न संतान ब्राह्मण, क्षत्रिय पति पत्नी से उत्पन्न संतान क्षत्रिय वैश्य पति पत्नी से उत्पन्न संतान वैश्य इस प्रकार जानना चाहिये।

हारीत संहिता का वचन है-
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैवमुत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः। 1|15
ब्राह्मणी में ब्राह्मण से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण ही कहा गया है।

अत्रि संहिता का वचन है- 
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय संस्काराद् द्विज उच्यते। 1|40
जन्म से ब्राह्मण जाना जाता है संस्कार होने पर द्विज-संज्ञा होती है।

गीता में गुणकर्मविभागशः कहने का अर्थ
यहाँ कर्म कहने का अर्थ वृत्ति या जीविका नहीं कर्तव्य है.
कर्म विभाग का अर्थ है विभिन्न वर्णों के कर्तव्य ।
गुण का अर्थ त्रिगुण सत्व रज और तम से है। गुण विभाग जन्म के साथ लगे हुये गुणों के अनुसार मनुष्यों का वर्गीकरण है।

कर्मणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवैर्गुणैः।
गीता 18|41
स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार कर्मो का विभाग हुआ है।
यहाँ " स्वभाव प्रभव " का भाव यही है कि   जन्मजात गुणों  के द्वारा ही वर्ण निश्चित होता है।

अब प्रश्न यह है कि विश्वामित्र क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर ब्राह्मण वर्ण में कैसे परिवर्तित हुयें?
उत्तर है तप से ।
कर्म से नहीं तप से 
यह बात विश्वामित्र जी भी जानते थे कि कर्म से ब्राह्मण बनना सम्भव ही नहीं है अतः उन्होने तप करने का निश्चय किया। 
कितने वर्ष तप किया?
हजारों वर्ष तप किया ?
तप का अर्थ ही है शरीर को तपाना ।
केवल  तप में ही वह शक्ति है जो शरीर के परमाणु बदल सकें। 
वर्ण का सम्बन्ध जन्मजात शरीर से है।
अब  तप के द्वारा शरीर के परमाणु बदले या नहीं इस बात का परीक्षण करना केवल वशिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षियों  के द्वारा ही सम्भव है। यही कारण है कि  ब्रह्मा जी ने उन्हे कह दिया था कि वशिष्ठ जी के अनुमोदन के बिना इस शरीर में ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असंभव है।

महाभारत के वनपर्व के 179अध्याय में सर्प और युधिष्ठिर का संवाद है।
सर्प युधिष्ठिर से पूछते है ब्राह्मण कौन है?

युधिष्ठिर कहते है सत्य, क्षमा, मृदुता  दानशीलता और तप ये गुण यदि किसी शुद्र में हो वह शुद्र    शुद्र नहीं है।  यदि ये गुण किसी ब्राह्मण में न हो तो वह ब्राह्मण      ब्राह्मण नहीं है।
 ब्राह्मण शब्द का प्रयोग यहाँ दो बार हुआ है और दो भिन्न अर्थों में हुआ है। 
यदि ऐसा न मानें तो यह कहना कि जिस ब्राह्मण  में ये गुण नहीं है वह  ब्राह्मण  ब्राह्मण नहीं है।  वदतो व्याघात होगा।
उक्त वचन में प्रथम बार जो ब्राह्मण शब्द का प्रयोग हुआ है वह जन्मना ब्राह्मण के अर्थ में हुआ है।
दुसरी बार ब्राह्मण शब्द का अर्थ यह है कि जो गुण ब्राह्मण में होने चाहिये वे उसमें नहीं है। इस वाक्य में ब्राह्मण के लिये आवश्यक सत्य क्षमा दानशीलता मृदुता तप इन गुणों की प्रशंसा कर ब्राह्मण को मिथ्या जात्याभिमान से बचाने के लिए आया है। 
यदि ऐसा न  होता तो चर्चा केवल  ब्राह्मण  और शुद्र की ही क्यो?   क्षत्रिय और वैश्य की क्यो नहीं ?
यदि गुण आधारित वर्ण होता तो गुण प्रतिशत भी होता।  यह भी होना चाहिये था कि 100% गुण वाला ब्राह्मण 75% गुण वाला क्षत्रिय 50% गुण वाला वैश्य और 25%गुण वाला शुद्र  और  00% वाला ?

लेकिन ऐसा नहीं है। 
इस वचन का यह मतलब नहीं है कि गुण देखकर वर्ण निर्धारित करना चाहिये। 
इसके विरुद्ध कई कारण है।
1. वदतो व्याघात  

2. वेद उपनिषद, मनुस्मृति, अत्रि संहिता, हारीत संहिता, आदि शास्त्र ग्रन्थों में जन्मना जाति की ही व्यवस्था है .उसके साथ इसका विरोध होगा।
किसी वचन का ठीक अर्थ लगाते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि अन्य वचनों के साथ उसका कोई विरोध न हो। उपयुक्त में श्रुत्यादि  वचनों का इसके सिवा और कोई अर्थ नहीं है कि वर्ण या जाति जन्म पर भी निर्भर है।
वनपर्व के उपयुक्त वचन का सुसंगत अर्थ यही होता है कि सत्य दान आदि गुण वरेण्य हैं।

3. किसी व्यक्ति के असली गुणों की पहचान अत्यंत कठिन है।

4. बहुत से लोगों ने सत्य, दान आदि गुण अत्यधिक परिमाण में होते ही हैं। यह तो इस वचन में नहीं बताया गया है कि कितने दर्जे तक कौन सा गुण होने से कौन मनुष्य ब्राह्मण वर्ग का हो सकता है।

5. इस वचन में दो ही वर्णो के नाम आए हैं ब्राह्मण और शुद्र । क्षत्रिय और वैश्य का कोई नाम नहीं है। जिसमें यह गुण हैं  ब्राह्मण है और जिसमें यह  गुण नहीं है वह शुद्र हैं। फिर तो अखिल मानव जाति का ब्राह्मण और शुद्र  यही दो वर्णविभाग हुआ, चतुर्वर्ण्य नहीं रहा। इन सब बातों से यही स्पष्ट होता है कि उपरोक्त वचन का हेतु वर्ण विभाग का सिद्धांत बतलाना नहीं बल्कि सत्य, सदाचार आदि गुणों की श्रेष्ठता बतलाना है। वर्ण विभाग का सिद्धांत अन्य शास्त्र वचनों में निर्दिष्ट हो चुका है। शास्त्रवचन जन्मना जाति का ही निर्देश करते हैं। 
अतः जो वचन ऐसे हैं जिनमें गुणों और कर्मों के अनुसार जाति होने की बात सूचित होती है उनका वास्तविक अभिप्राय कुछ और ही है। गुण या कर्म के अनुसार सब मनुष्य की जाति का निर्धारण करना व्यवहारतः संभव ही नहीं है।

 कुछ लोग ऐसा कहते हैं जन्म नाम की आकस्मिक घटना के आधार पर किसी की जाति या वर्ण निश्चित करना ठीक नहीं है। यह कहना भी युक्तियुक्त नहीं है। कारण जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि हमारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल पर आधारित है। यही कारण है कि  कुछ लोग स्वस्थ और सम्पन्न  पैदा होते हैं जबकि कुछ विकलांग और दरिद्र। यह हमारे कर्मों के फल पर आधारित है।
कुछ लोग कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था हिंदू समाज में पैदा हुई समस्त बुराइयों की जड़ है।
गीता में श्रीभगवान कहते हैं चतुर्वर्ण्य  मैंने ही उत्पन्न किया है। जो व्यवस्था भगवान की बनाई हुई है वह  समाज के लिए कभी हानिकारक नहीं हो सकती।  हमारे पिछडेपन और बिखराव का मुख्य कारण  हमारी ईर्ष्या-द्वेष, लड़ाई-झगड़े, भोग-विलास आदि हैं। विश्व की प्राचीनतम  हिंदू संस्कृति की रक्षा अब तक इस कारण से हुई है क्योंकि वर्ण व्यवस्था के द्वारा धर्म, शोर्य, धन और श्रमशक्ति की रक्षा हुई है। 
यदि हम वर्णव्यवस्था को समाप्त कर देंगे महान अनर्थ होगा समाज में  वर्णसंकरता उत्पन्न होगी गीता में श्रीभगवान कहते हैं वर्णसंकरतासे प्रजाओं का सब  प्रकार से नाश होता है।
सुरभि के लिये आचार्य रोहित वशिष्ठ 9690066000

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