सोमवार, 27 सितंबर 2021

श्राद्ध महिमा

सनातन धर्म पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानता है। धर्म ग्रन्थों का सार है जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है और जो मर जाता है उसका जन्म भी अवश्य होता है।  शरीर के नष्ट होने पर आत्मा नष्ट नहीं होता आत्मा अजर, अमर, नित्य और अव्यय है― यह सिद्धांत सनातन धर्म का सिद्धांत है।
 अपने किये शुभ अशुभ कर्मो के फल को जब तक  नही जाता तब तक उसको मुक्ति नहीं मिलती। इसीलिए मुक्ति प्राप्ति के लिए निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए― ऐसा धर्म शास्त्रों ने निश्चित किया है। 
साधना-आराधना करते करते किसी जन्म में मनुष्य को ततो याति परां गतिम्। अर्थात परम गति को पाता है। यदि साधना-आराधना के आभाव में और यह मानव जीवन यूं ही भोग-विलास में यू ही बिता  दिया जाए तो फिर पुनरपि जननं पुनरपि मरणं की श्रंखला में वह  बंधा ही रहता है।
जन्म और मरण स्थूल शरीर का होता है । सूक्ष्म और कारण शरीर में जन्म जन्मांतर के संस्कार संचित रहे हैं। यह  सूक्ष्म और कारण शरीर बड़ा ही विलक्षण है।  परलोक की यातना, नरक की यंत्रणा से न तो यह नष्ट होता है और न ही स्वर्ग के सुख-उपभोग  से विकार को प्राप्त होता है।  यह इतना विलक्षण होता है विशालकाय हाथी जैसे शरीर में तो रहता ही है साथ ही कीटाणु और चीटी जैसे  छोटे शरीर में भी  रह सकता है।
 जब कभी उसे मनुष्य का शरीर मिलता है तभी उसकी मुक्ति की सम्भावना बनती है। इसलिये मनुष्य शरीर को  साधन धाम मोक्ष कर द्वारा  कहकर इसकी महत्ता को प्रतिपादित किया गया है। इस मनुष्य शरीर में ही व्यक्ति साधन के द्वारा अपना कल्याण कर सकता है मनुष्य शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी शरीर के द्वारा जन्म मरण के चक्कर से छूटना अत्यंत कठिन है। ।
धर्म शास्त्रों में परलोक का वर्णन अनेक स्थानों पर किया गया है।
उनमें से एक  कठोपनिषद का वचन है― न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तंवित्तमोहेन मूढ़म। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यतेमे।। 1|2|6
 यम  नचिकेता से कहते हैं कि धन के मोह से मोहित, प्रमादी,  अज्ञानी को परलोक  प्रतिभासित नहीं होता। वह समझता है कि यही लोक है परलोक नहीं है― ऐसा मानने वाला पुरुष बारम्बार मेरे वश को प्राप्त होता है।
इसी परलोक और पूनर्जन्म के सिद्धांत के आधार पर धर्म शास्त्रों में मृतक श्राद्धकर्म  को अनिवार्य  कहा गया है। इस कर्म को  हम आश्विन कृष्ण पक्ष में करते हैं। वह पक्ष  पितृपक्ष कहलाता है।
इस पूरे पक्ष में  नित्य और नैमित्तिक पितरों का श्राद्ध और तर्पण पिंडदान आदि कर्म किया जाता है। उसी श्राद्ध-तर्पण-पिण्डदान का अंग ब्राह्मण-भोजन है।
 इस लोक में अथवा परलोक में और जहाँ कही भी पितरों का निवास होता है― वहीं वेद मंत्रों के द्वारा श्राद्ध-कर्म से पितरों की तृप्ति होती है। इस कर्म को करते समय संशय  नहीं रखना चाहिए। क्योंकि धर्म ग्रन्थों में  अनैक स्थानों पर श्राद्ध कर्म की महिमा वर्णित है।
पितृलोक में किस प्रकार पितरों की प्राप्ति होती है? इस विषय में धर्म शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है हमारे द्वारा प्रदत्त वस्तु किस प्रकार हमारे पितरो तक पहुँचती है उसे हम इस उदाहरण के द्वारा  समझ  सकते है। 
 यदि  अमेरिका आदि देशों में रह रहे किसी  परिचित को  भारत से धनराशि धनराशि भेजनी है तो हम उस धनराशि को बैंक में जमा करके बैक के माध्यम से उस धनराशि को अमुक व्यक्ति तक  भिजवाँ सकते हैं। लेकिन यह बात तो  हम सभी को ज्ञात है कि हमने भले ही भारतीय मुद्रा  में  धन जमा किया हो उस व्यक्ति को वह धन उस देश की मुद्रा के रूप में प्राप्त होगा।  इसी छोटे से उदाहरण से  हम श्रद्धा के विषय को भी समझ सकते है।  ब्राह्मण के माध्यम से एवं वेदमंत्रों के प्रभाव से हमारे द्वारा दिया गया श्राद्धान्न  हमारे पितरों  को इसी प्रकार अन्य लोकों  में प्राप्त हो जाता है। 
पद्म पुराण के सृष्टि खंड के 33वें अध्याय में कथा आती है कि वनवास के समय पुष्कर क्षेत्र में एक बार महाराजा दशरथ के श्राद्ध का समय उपस्थित हुआ। उस दिन बनवासी ब्राह्मणों को भोजन के लिए निमंत्रित किया गया। श्राद्ध के समय जब ब्राह्मण भोजन के लिए आये  तो भोजन करते समय उन्हें देख श्री सीता माता जी छिप  गई। तब भगवान राम ने पूछा कि ― हे सीते! इस समय तुम छिप क्यों गई हो?  तब सीताजी ने कहा कि ― हे राघव ! मैंने भोजन करते हुए ब्राह्मणों के शरीर में आपके पिताजी को देखा है। इसलिये लज्जा   के कारण मै यहाँ से हटकर  छिप गई हुँ।
पिता तव मया दृष्टो ब्राह्मणांगेषु राघव।
दृष्ट्वा त्नपान्विता चाहमपक्रान्ता तवान्तिकात्।।
जिस समय मेरा विवाह हुआ था तब पिताजी ने मुझे सर्वालंकार विभूषित देखा था तब हर्ष से फूले नहीं समाते थे ।अयोध्या से जब मैं वन को चली तो मेरे तपस्विनी वेश को देख कर इतने दुखी हुए थे कि उन्होंने अपना शरीर ही त्याग दिया था। यहाँ  मुझे संदेह हुआ  कि इस समय ऐसी अवस्था में मुझे देखकर कहीं ऐसा न हो कि वह दुखी होकर अपने पितृ शरीर को ही  न छोड़ दे।  दूसरा यह भी है कि इस समय जो भोजन श्राद्ध में था वह ऐसा था जिसे कभी महाराज के सेवकों ने भी नहीं खाया होगा  उसे मैं अपने ससुर को कैसे परोसती?  उन्हें देखकर मैं लज्जा और दुःख  के कारण आपके पास से हट गई।  भला मैं अपने स्वर्गीय महाराज के सामने कैसे खड़ी होती?  यही इसका कारण था। 

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड 102वें अध्याय  में भी श्राद्ध का वर्णन आया है वहाँ  पर लिखा है कि ― श्री रामचंद्र जी ने भाइयों सहित मंदाकिनी के तट से ऊपर आकर पिता को पिंडदान किया। श्री राम जी ने बेर मिले हुए इंगुदी  के फलों का पिंड बनाकर कुशाओं  के ऊपर रखकर अत्यंत दुखी होकर रोते हुए कहा कि ― हे महाराज आजकल हम लोग जो  खाते हैं वहीं इस समय आप भी भोजन कीजिए। क्योंकि मनुष्य जो स्वयं खाता है उसी से वह अपने देवताओं को भी संतुष्ट करता है।  इस प्रकार भगवान राम के द्वारा पिता के श्राद्ध-कर्म का वर्णन है।
 वेद में भी श्राद्धकर्म के विषय म़े लिखा है―
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः।
सर्वांस्तानग्र आवह पितृन् हविषं अत्तये।।
अथर्ववेद 18|2|34
अर्थात जिन पितरों के शरीर पृथ्वी में गाड़े गए हैं या छोड़ दिए गए हैं या अग्नि में जला दिए गए हैं और वे ऊर्ध्व स्वर्गादि  लोगों को चले गए हैं, हे अग्ने! हमारे उन सब पितरों को श्राद्ध के समय भोजन के लिये आवाहन करों। ©आचार्य रोहित वशिष्ठ 9690066000

शनिवार, 18 सितंबर 2021

अमृत बिन्दु

मंत्र जाप  मम दृढ़  विश्वासा।
पंचम भजन जो वेदप्रकाशा।।
" भगवान  मेरा कल्याण करेगें " ―  इस दृढ़ विश्वास के साथ मंत्र जप करने से मनुष्य शीघ्र ही कल्याण का भागी होता है।

बुधवार, 15 सितंबर 2021

तत्व विवेचन

लेखक - वीतराग शिरोमणिपरमपूज्य गुरूदेव समर्थ श्री जी 

समग्र प्रपंच को समझने के लिए कुछ विचारक 24 तत्व,कुछ 36 तत्व ,कुछ 96 तत्व मानते हैं।
महामुनि ऋभु की जिज्ञासा पर
वराह भगवान...कहते हैं।
चतुर्विंशति तत्त्वानि केचिदिच्छन्ति वादिनः।
केचित् षट्त्रिंशत् तत्त्वानि केचित् षण्णवतीनि च।।वराहोपनिषत्1/1
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5-ज्ञानेन्द्रियाँ(श्रोत्र त्वचा नेत्र जिह्वा घ्राण)
5-कर्मेंद्रियां(वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ)
5-प्राण अपान व्यान उदान समान
5-शब्दादि विषय(शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध)
4-अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार)
1-प्रकृति
इस प्रकार प्रकृति सहित 24 तत्त्व ही 25 तत्त्व हुए।
चतुर्विंशति तत्त्वानि तानि ब्रह्मविदो विदुः।।1/4वराहोपनिषत्
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इन्हीं {ज्ञानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां प्राण शब्दादि विषय अन्तःकरण और प्रकृति रूप} 25 तत्त्वों में अग्रिम 11 तत्त्व मिलाने से 36 तत्त्व होते हैं।
5-पंचीकृत महाभूत (भू जल अग्नि वायु नभ)
3-देहत्रय (स्थूल सूक्ष्म कारण)
3-अवस्थात्रय (जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति)
11+25=36
आहत्य तत्त्वजातानां षट्त्रिंशन् मुनयो विदुः।।1/7
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इन्हीं {ज्ञानेद्रियां कर्मेन्द्रियां प्राण शब्दादि विषय अन्तःकरण प्रकृति पंचीकृत महाभूत शरीरत्रय अवस्थात्रय रूप}36 तत्त्वों में अग्रिम 60 तत्त्वों को मिलाने से 96 तत्त्व पूर्ण होते हैं।
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6-विकार (अस्ति जायते वर्धते परिणाम क्षय नाश)
6-ऊर्मि (अशना पिपासा शोक मोह जरा मृत्यु)
6-कोश (त्वक् रक्त मांस मेद मज्जा अस्थि)
6-शत्रु (काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य)
3-जीव (विश्व तैजस प्राज्ञ)
3-गुण (सत रज तम)
3-कर्म (प्रारब्ध क्रियमाण संचित्)
5-कर्मेन्द्रियकर्म (वचन आदान गमन विसर्ग आनंद)
4-अन्तःकरणकर्म (संकल्प अध्यवसाय (निश्चय) अभिमान अवधारणा)
4-चित्तधर्म (मुदिता करुणा मैत्री उपेक्षा)
5-ज्ञानेन्द्रिय देवता (दिशा वायु सूर्य वरुण अश्विनीकुमार)
5-कर्मेन्द्रियदेवता (अग्नि इन्द्र उपेन्द्र यम प्रजापति)
4-अन्तःकरणदेवता (चंद्र ब्रह्मा रुद्र क्षेत्रज्ञेश्वर)
इस प्रकार ये 60 तत्त्व और पूर्वोक्त 36 तत्त्व कुल मिलाकर 96 तत्त्व हो गये।
आहत्य तत्त्वजातानां षण्णवत्यस्तु कीर्तिताः।।1/15

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

आशीर्वाद―आवश्यकता और सही विधि

प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं
विधीयते साधु मिथः सुमध्यमे।
प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा
गुहाशयायैव न देहामानिने।।
श्रीमद्भागवत 4|3|22
श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध के तृतीय अध्याय में भगवान शिव माता सती से कहते हैं– यह सम्मुख जाना, नम्रता दिखाना, प्रणाम करना आदि क्रियाएं जो लोक-व्यवहार में परस्पर की जाती हैं; वे तत्व ज्ञानियों के द्वारा बहुत अच्छे ढंग से की जाती है। वें अंतर्यामी रूप से सबके अंतःकरण में स्थित परमात्मन्-पुरुष  को ही प्रणाम करते हैं; शरीर और शरीर में अभिमान रखने वाले अहंकार को नहीं करते।
सनातन धर्मी समाज में बडप्पन का कारण धन,ऐश्वर्य, पद नहीं है।
अपने वर्ण में समान शिक्षित धनी पुरुष भी अपने वर्ण के  वृद्ध पुरुष को पहले प्रणाम करता है, चाहे वह निर्धन ही क्यों न हो।  यही सनातनी हिंदू समाज का शिष्टाचार है।
 यदि सनातनी शिष्टाचार के विरुद्ध गर्ववश कोई व्यक्ति  अपने से बड़े व्यक्ति  को प्रणाम न करें तो बड़े को पहले प्रणाम नहीं करना चाहिए  और ना ही उसके प्रणाम किये बिना ही उसे आशीर्वाद ही देना चाहिए।
जब बड़ा पुरुष छोटे को प्रणाम करता है या बिना प्रणाम किये ही  आशीर्वाद देता है उसके ऐसा करने से  छोटे का तेज, आयु, कीर्ति और लक्ष्मी का ह्रास होता है।
 अतः उसे बुरा भी लगे तो भी उसके हित के लिए बड़ों को ऐसा नहीं करना चाहिए ।
जिसे प्रणाम किया जाता है उसे यह समझना चाहिए कि यह परिणाम उसके शरीर को नहीं किया गया है।  यह प्रणाम उसके हृदय में स्थित परमात्मा को किया गया है। प्रणाम करने वाले को अपनी शुद्धि-अशुद्धि का विचार करना चाहिए परंतु जिसे प्रणाम किया गया है उसे प्रणाम करने वाले की शुद्धि अशुद्धि का विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रणाम वह अपने शरीर के लिए नहीं ले रहा है।  यदि शरीर की दृष्टि से यह विचार करता है तो उसका अर्थ यह है कि प्रणाम उसने शरीर की दृष्टि से स्वीकार किया गया है। इससे उसके तेज की हानि होती है।  प्रणाम करने पर उसे मर्यादा का पालन करते हुए आशीर्वाद देना ही चाहिए।
 यह आशीर्वाद वह  देह में स्थित सर्वसाक्षी की ओर से दिया जाता है ।
 किसी के प्रणाम करने पर भी आशीर्वाद ने देना, मौन रहना, संकेत से स्वीकृति देना  करना अशिष्ट कहलाता है। दोनों हाथों की अंजली सम्मुख करके आशीर्वाद देना शास्त्र निर्दिष्ट है।

 दोनों हथेलियों प्रणत के मस्तक पर स्थापित करके उसे आशीर्वाद देना यह आशीर्वाद की पूर्णता है। केवल मुख से आशीर्वचन का उच्चारण करना आशीर्वाद देने का संक्षिप्त रूप है।  
समान व्यक्ति प्रणाम करने के बदले प्रणाम ही करते हैं।
 यदि चरणों में प्रणाम करने वाला व्यक्ति श्रद्धावश कुछ क्षण चरणों में ही माथा रखे रहे तो उसे उसे उठने की प्रेरणा देना या अपने दोनों हाथों से उसे उठाना यह भी शिष्टाचार है।  यदि कोई भगवान के नाम-स्मरण से अभिवादन करता है तो हमें भी उसी नाम-स्मरण से उत्तर देना चाहिए।  जैसे यदि हमें राम-राम कहे तो हमें भी उसे राम-राम कह कर ही उत्तर देना चाहिये।  कोई जय श्री कृष्ण कहे तो हमें भी उसे जय श्री कृष्ण कह कर ही उत्तर देना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे संप्रदाय के लोगों से व्यवहार करते समय प्रणाम आदि का ऐसा ही रूप होना चाहिए। उसे चिढ़ाने के लिये नहीं भगवन्नामोच्चार नहीं करना चाहिये।

शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा― विधिमुख से तथा निषेधमुख से (कल्याणकारी लेख)

लेखक―वीतरागशिरोमणि, नैष्ठिकब्रह्मचारी, अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ के अध्यक्ष परम पूज्य प्रातःस्मरणीय गुरूदेव  समर्थश्री स्वामी श्री त्रयंबकेश्वर चैतन्य जी महाराज 
 शिक्षा प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, सीखने वाला चाहिये। 
निरन्तर होता परिवर्तन हमें संसार की नश्वरता का बोध कराता है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई, तुलसीदास, रैदास, कबीर, सूरदास, नरसी आदि का चरित्र देखकर, सुनकर हमें चाहिए की बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों का अनुसरण करें। कसंग को छोड़कर सत्संग करें।  अन्याय-अनीति को छोड़कर न्याय-रीति से चलें।  अन्याय-अनीति का प्रतिकार करें, चुप न बैठें।  कहते हैं अन्याय करना पाप है तो अन्याय सहना महापाप है, परंतु अन्याय होते देखकर चुप रह जाना, उसका विरोध ना करना घोरातिघोर महापाप है।

 आपको अपने मन की बात बताते हैं― जब हम छोटे थे, घर वालों के साथ रामलीला देखने गये।  रामलीला में श्री विश्वामित्र जी महाराज के साथ श्री राम-लक्ष्मण को देखा बस मन अटक गया। उनके वस्त्रों को,  बोलने के ढंग को देखते ही मन में भाव जगा कि हमको भी ऐसा ही बनना है।  यह तो पता नहीं कि उनके जैसे बने या कि नहीं बने परंतु वेशभूषा एवं जीने का ढंग उनके जैसा हो ही गया। सत्य तो यह है कि इंसान जैसा होना चाहता है एक-ना-एक  दिन वैसा हो ही जाता है।  यह व्यक्ति की तत्परता और लगन पर निर्भर करता है कि ये सफर कितना शीघ्र पूर्ण  होगा और कितनी देर लगेगी। 
      संभवतः हम सप्तमी कक्षा में पढ़ते थे वहाँ हमारे एक अध्यापक थे जिनकी शालीनता, योग्यता तथा व्यवहारोन्मुख  सहयोगात्मक  प्रवृत्ति के कारण उनका बहुत सम्मान होता था।  एक दिन में छुट्टी के उपरांत विद्यालय से अपने घर जा रहे थे, रास्ते में एक सम्भ्रान्त घर का प्रोढ़ व्यक्ति मदिरा के नशे में बेहोश होकर नाली में पड़ा था। उसके शरीर को कुत्ते काट रहे थे।  हमने भी वह दृश्य देखा और कुछ हँसी, कुछ घृणा, कुछ निन्दा का भाव जगा।  समाधान कुछ हुआ नहीं। दिन गुजरा, रात बीती,  अगले दिन विद्यालय गए उन्ही गुरुजी का कालांश (पीरियड) आया।  उन्होंने दो शब्द प्रयोग किये,  वे शब्द आज भी उनकी उसी गम्भीरता और प्रेमरस से सराबोर ध्वनि में हृदय में संरक्षित हैं।  उन्होंने कहा था बच्चों!  हमें शिक्षा दो प्रकार से मिलती है 
1.  अच्छे इंसान के अच्छे कर्म से,  2. बुरे आदमी के बुरे कर्म से ।
पहली बात तो समझ में आ ही जाती है, परंतु दूसरी बात समझ में नहीं आती। भाई बुरा इंसान क्या शिक्षा देगा?  उससे क्या सीखे? बड़ा सीधा साधा सा ढंग उन्होंने बताया कि अच्छा इन्सान कुछ अच्छा कर्म करें तो हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम भी ऐसा ही अच्छे कर्म करें।  जब बुरा इन्सान कोई समाजविरोधी अनैतिक कार्य करें तो उसे देखकर घृणा न करो, निन्दा न करों, उपहास मत उड़ाओ,  अपितु उसको भी गुरु मानकर शिक्षा लो कि हम जीवन में ऐसा कार्य कदापि नहीं करेंगे।  बुरे इंसान से घृणा नहीं बल्कि बुराई से घृणा करो। जीवन में विविध रंग, विविध ढंग, विविध संग, विविध जंग के पल आते हैं, समझदार वही है, जो संतुलन बनाए रखता है। राग-द्वेष में, मित्र-शत्रु, में, लाभ-हानि में, जय-पराजय में, जन्म-मरण के संदेश में, सुख-दुःख में, सर्दी-गर्मी में, अनुकूलता-प्रतिकूलता में, यश-अपयश, में भवन-वन में, सुस्वादु-नीरस भोजन में ― कहाँ तक कहे, जीवन के प्रत्येक कदम पर संतुलन अपेक्षित है। संतुलन शब्द बहुत छोटा है, परंतु किसी एक शब्द से समग्र शास्त्रों का नैतिक तत्व, जीवन जीने की कला,  जीवन-दर्शन भरा हुआ है। जिसने सन्तुलन बना लिया, उसने जीवन बना लिया। किसी भी स्थिति में वह प्रौढ़ व्यक्ति बिखरता नहीं, तमाशा नहीं बनता।
 हम लोग अपने जीवन का बेशकीमती समय व्यर्थ की चर्चा, व्यर्थ की चिन्ता,  व्यर्थ के विवादों में गवाँ देते है,  जबकि हमको आत्मचिन्तन करके अपनी  स्थिति का आंकलन करना चाहिए कि मैं क्या हूँ? मेरी अच्छाई-बुराई क्या है?  मेरी शक्ति तथा  मेरी कमजोरी क्या है? तदनन्तर  उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए, जिससे कि हमें सफलताओं की प्राप्ति में सहजता हो।  जब जीवन सुनियोजित हो तब सफलताओं की संभावनाएं बढ़ जाती है।  हमको लगता है कि जगत् में जो कुछ भी है, अच्छा या बुरा सबसे  कुछ-न-कुछ सीखा जा सकता है। आप सोचो! क्या व्यभिचार-परायणा सवेच्छाचारिणी  कोई वेश्या भी कुछ शिक्षा दे सकती है?  नहीं न!  क्योंकि उसकी शिक्षा, उसके संस्कार, उसकी संगति तो हमको पतन की ओर ले जा सकती है, दुश्चरित्रता के दलदल में फंसा सकती है, यही बात है न ! परंतु भारतीय ऋषि-परम्परा के देदीप्यमान नक्षत्र, अद्वैतनिष्ठा  के प्रतिमान, साधुता की  कसौटी, परमानंद की मस्ती के समुद्र में सदा निमग्न  रहने वाले अत्रिनंदन दत्तात्रेय जी महाराज ने अपने जीवन में 24 गुरुओं की चर्चा की है।  आश्चर्य यह है कि ना तो उन्होंने किसी गुरु से दीक्षा ली और ना ही किसी गुरु को  दक्षिणा दी। दीक्षा और दक्षिणा की व्यवहारिक ओपचारिकताओं से रहित होकर उन 24 गुरुओं से   शिक्षा भी ली, उनको  गुरू भी माना, परन्तु उन गुरुओं खबर तक नहीं। 
(हम गुरुओं की नजर  में आना चाहते है, उनकी लिस्ट में नाम चाहते हैं, परंतु उनकी शिक्षाओं  पर नहीं चलते, यही विडंबना है)
 दत्तात्रेय जी ने कहा कि मैं एक बार भ्रमण करता हुआ मिथिला पहुंच गया, रात्रि के समय बाजार में एक स्थान पर विश्राम हेतु  बैठ गया।  सारी दुनियां चैन की नींद सो रही थी। वहीं पर एक सुंदर से भवन में श्रृंगार करके एक सुंदरी आने-जाने वालों को देखती, बार-बार अंदर जाती, बाहर आती।  बेचैनी में जागते हुये पूरी रात गुजर गई,  परंतु कोई ग्राहक नहीं आया । मैंने पता किया तो जाना कि यह सर्वोत्तमा सुंदरी मिथिला की वेश्या पिंगला है। प्रातःकाल 4 बजे मंदिरों की घंटियां बज उठी। शंख की मांगलिक ध्वनि से दिशाएँ  गूँजने लगी। मंत्रोच्चारण तथा प्रार्थनाओं के प्यारे स्वर हवा के साथ तैरते हुए दूर तक अठखेलियाँ करने लगे और उधर पिंगला ने श्रृंगार फेंक दिया,  बेचैनी और निराशा की जगह मुखमण्डल पर प्रसन्नतामिश्रित सोम्यता,  निश्चिन्तता, शांति की प्रभा ने अड्डा जमा लिया।  सहसा पिंगला बोल उठी―छिः-छिः,  मेरा सारा जीवन नश्वर संसार के, नश्वर भोगों की पूर्ति के लिए, नश्वर प्राणियों की ओर आशा भरी नजरों से निहारते बीत गया।  मैंने कभी अपने अंतर्मन में बैठे प्राणधन प्रियतम की ओर देखा तक नहीं। हे अभागिन पिंगले!  तू जाग जा, वासना की  गंदी नाली को छोड़ उपासना की गंगा में अवगाहन कर । अब लौं नसानी अब ना नैसेहौं ― अब तक जीवन व्यर्थ गया, अब एक पल भी व्यर्थ नहीं करना।  संसार की आशा दुख देती है और संसार से निराश होने में ही सुख है।
 आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
पिंगला वेश्या की इस बात को सुनकर दत्तात्रेय जी ने पिंगला को मन ही मन नमन करके गुरु मान लिया और मन में ठान लिया कि अब किसी से आशा या अपेक्षा नहीं करना,  क्योंकि अपेक्षा ही उपेक्षा कराती है। आप किसी से अपेक्षा ना करो तो कोई उपेक्षा कर ही नहीं सकता। सन्त ने वेश्य से भी कुछ सीख लिया और एक हम हैं कि सन्तों से भी कुछ सीखने को तैयार नहीं। 
 पूरा जगत हमारा गुरू है, हमें सावधानी पूर्वक अच्छाई-बुराई का निर्धारण करके जीवन पावन बनाना है।
साभार―गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के जून 2021 के अंक से

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

धृतराष्ट्र का युधिष्ठिर के प्रति वचन

नाहं तथा ह्यर्जुनाद् वासुदेवाद्,
भीमाद् वाहं यमयोर्वा विभेमि।।
यथा राज्ञ क्रोधदीप्तस्य सूत
 मन्ययोरहं भीततरः सदैवः।
महातपा ब्रह्मचर्येण युक्तः
संकल्पोsयं मानसस्तस्य सिद्धयेत्।।
(महाभारत उद्योगपर्व)
संजय! मैं अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन, तथा नकुल-सहदेव से भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोध से तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिर के कोप से । उनके रोष से  मैं सदा ही अत्यंत भयभीत रहता हुँ; क्योंकि वें महान तपस्वी और ब्रह्मचर्य से संपन्न हैं; इसलिए उनके मन में जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
(महाराज धृतराष्ट्र संजय से)

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों के सोलह भेद (परम पूज्य गुरुदेव समर्थश्री जी)

परम पूज्य गुरूदेव समर्थश्री जी
ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों के सोलह भेद...
{अथातश्चत्वार आश्रमाः तेषाञ्च षोडषभेदा भवन्ति}
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ब्रह्मचारी के चार भेद=

1-गायत्रः{उपकुर्वाण}= 
उपनयन संस्कारानन्तर त्रिरात्रपर्यंत लवणरहित आहार कर गायत्री जपासक्त रहने वाले ब्रह्मचारी को गायत्र कहा जाता है।

2-ब्राह्मणः=
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक {प्रत्येक वेदाध्ययन् हेतु 12×4=48वर्ष के योग से} वेदाध्ययन करने वाला ब्रह्मचारी ब्राह्मण कहलाता है। अथवा 24 वर्ष तक गुरुकुलवासी ब्राह्मण कहाता है।

3-प्राजापत्यः
48 वर्ष तक गुरुकुलवास करने पर प्राजापत्य संज्ञा होती है।अथवा केवल स्वदार में ही निरत, केवल शास्त्राज्ञानुरूप विहित तिथि में ही ऋतुकालाभिगामी तथा सर्वदा सर्वथा परदारवर्जी को प्राजापत्य ब्रह्मचारी कहा जाता है।

4-बृहन् {नैष्ठिकः}=
आजीवन गुरुकुल की मर्यादा में रहकर निजाश्रमोचित शास्त्रीयानुशासन को मानने वाले नैष्ठिक अथवा बृहन् कहे जाते हैं।
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गृहस्थी के चारभेद...

1-वार्ताकवृत्तयः=
कृषि गोरक्षा तथा अगर्हित अनिन्दित {शास्त्रनिषेधमुक्त}व्यापार द्वारा न्यायोचित अर्थाजन से स्वाहा स्वधा तथा पंचमहायज्ञादि पूर्वक आत्मकल्याण में प्रवृत्त सदाचारी गृहस्थ को वार्ताकवृत्ति कहा जाता है।

2-शालीनवृत्तयः=
जो वेदाध्ययन् करके वृत्यर्थ पढाते नहीं।स्वयं यजमान बनकर यजन तो करते हैं परन्तु आचार्य बनकर यजन नहीं कराते।
यथाशक्ति नित्य दान तो करते हैं परन्तु प्रतिग्रह{दान}नहीं लेते।निरन्तर परमार्थ साधन में लगे रहते हैं।

3-यायावराः=पर्यटनशीलाः
जो पठन पाठन यजन याजन दान प्रतिग्रह आदि षट्कर्म करके आत्मज्ञान हेतु साधनरत रहते हैं।

4-घोरसंन्यासिकाः= सर्वथा संग्रह परिग्रह प्रतिग्रहशून्य अश्वस्तनिक कल की चिन्ता न करने वाले साधक दम्पती,
जो जल तक की शुद्धता का विशेषविचार कर पवित्रजल से क्रिया सम्पादन कर,प्रतिदिवसीय उञ्छवृत्ति से संकलित धान्य द्वारा जीवन निर्वाह कर आत्मज्ञान में निरत होते हैं।
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वानप्रस्थी के चार भेद...

1-वैखानसाः=विखनसं ब्रह्माणं वेत्ति तपसा
वनक्षेत्र में समुत्पन्न{अग्रामोद्भूत}अकृष्टपच्य अहल्यभूम्युत्पन्न{बिना हल चलाये ही उपजे हुए अन्न}औषधि वनस्पति आदि द्वारा पञ्चयज्ञादि सम्पन्न कर आत्मकल्याण में निरत वानप्रस्थी को बैखानस कहा जाता है।

2-उदुम्बराः= औदुम्बरेण जीवन्तीति

प्रातः जगते ही जिस दिशा में भाव बने चल पडे और दैनिककृत्य सम्पन्न कर वहां से गूलर बेर नीवार सामकादि साधन लाकर अग्निचर्या पूर्ण कर पंचमहायज्ञ करके,आत्मकल्याण में लगे रहने वाले औदुम्बर होते हैं।

3-बालखिल्याः=प्राणोपमाःतपसि निरताः अतिसूक्ष्माः ब्रह्मणो रोमेभ्योत्पन्ना वा

जटा चीर मृगचर्म वल्कल {वृक्षत्वक्}धारी आषाढ पूर्णिमा से कार्तिकपूर्णिमा {चातुर्मास} तक फलमूलाशी होकर रहने वाले,शेष आठ मास तक वृत्युपार्जन करके पंचमहायज्ञादि करते हुए आत्मकल्याण साधन करने वाले बालखिल्य कहे जाते हैं।

4-फेनपाः=फेनं पिबन्तीति अल्पाहारसूक्ष्माहारसेविनः

उन्मत्तवत् सूखे गिरे हुए पत्ते फलादि खाते हुए,यत्रकुत्रापि एकान्तवास करते यथासंभव पंचमहायज्ञ करते हुए अग्निचर्या सम्पन्न करके आत्मकल्याण में निरत फेनप कहे जाते हैं।
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सन्यासी के चार भेद...

1-कुटीचराः=कुट्यां चकते/चरते वा इति कुटीचकः

 स्वजनों के द्वारा प्राप्त भिक्षा से प्रसन्न निश्चित कुटिया में रहकर आत्मानुसंधानरत संन्यासी को कुटीचक कहा जाता है।

2-बहूदकाः= बहूनि उदकानि शौचांगतया यस्य सः ते

त्रिदण्डी कमण्डलु छींका जल कुशा पादुका आसन शिखा सूत्र कौपीन काषायवेषधारी,विप्रकुलात भिक्षाव्रती, आत्मानुसन्धानकर्ता संन्यासी  बहूदक कहाते हैं।

3-हंसाः= नीरक्षीरविवेकीहंसवत् नित्यानित्यवस्तुविवेकशीलाः

एकदण्डी सूत्रशिखारहित {शिखावर्जिताs यज्ञोपवीतधारिणः} कमण्डलुधर,ग्राम में एकरात्रि मात्र रहने वाले,नगर या तीर्थ में पंचरात्र रहने वाले,निरंतर एकरात्रव्रत द्विरात्र व्रत कृच्छ्रव्रत अथवा चांद्रायणादि करते रहने वाले,आत्मानुशीलनरत संन्यासी हंस कहे जाते हैं।

4-परमहंसाः=हंसेभ्योपि पराः इति
अव्यक्तलिङ्गा दण्डादिरहित चंदन माला उपासनापद्धति वस्त्रादि से भी ज्ञात न होने वाले आचार विचार सम्पन्न शून्यागार देवागार निवासी धर्माधर्ममुक्त विधिनिषेध से पार समलोष्टाश्मकांचन सर्वत्र भिक्षाचारी ब्रह्मवित् महात्मा परमहंस कहे जाते हैं।

स्रोत..आश्रमोपनिषत्..
परम पूज्य गुरूदेव
समर्थ श्री जी

बुधवार, 1 सितंबर 2021

धर्म की जय हो!


धर्म की जय हो!

धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज की जय हो!
 
गुरूदेव श्री समर्थ श्री जी महाराज की जय हो! 

नमःपार्वतीपतये हर-हर महादेव!

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