समग्र प्रपंच को समझने के लिए कुछ विचारक 24 तत्व,कुछ 36 तत्व ,कुछ 96 तत्व मानते हैं।
महामुनि ऋभु की जिज्ञासा पर
वराह भगवान...कहते हैं।
चतुर्विंशति तत्त्वानि केचिदिच्छन्ति वादिनः।
केचित् षट्त्रिंशत् तत्त्वानि केचित् षण्णवतीनि च।।वराहोपनिषत्1/1
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5-ज्ञानेन्द्रियाँ(श्रोत्र त्वचा नेत्र जिह्वा घ्राण)
5-कर्मेंद्रियां(वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ)
5-प्राण अपान व्यान उदान समान
5-शब्दादि विषय(शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध)
4-अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार)
1-प्रकृति
इस प्रकार प्रकृति सहित 24 तत्त्व ही 25 तत्त्व हुए।
चतुर्विंशति तत्त्वानि तानि ब्रह्मविदो विदुः।।1/4वराहोपनिषत्
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इन्हीं {ज्ञानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां प्राण शब्दादि विषय अन्तःकरण और प्रकृति रूप} 25 तत्त्वों में अग्रिम 11 तत्त्व मिलाने से 36 तत्त्व होते हैं।
5-पंचीकृत महाभूत (भू जल अग्नि वायु नभ)
3-देहत्रय (स्थूल सूक्ष्म कारण)
3-अवस्थात्रय (जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति)
11+25=36
आहत्य तत्त्वजातानां षट्त्रिंशन् मुनयो विदुः।।1/7
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इन्हीं {ज्ञानेद्रियां कर्मेन्द्रियां प्राण शब्दादि विषय अन्तःकरण प्रकृति पंचीकृत महाभूत शरीरत्रय अवस्थात्रय रूप}36 तत्त्वों में अग्रिम 60 तत्त्वों को मिलाने से 96 तत्त्व पूर्ण होते हैं।
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6-विकार (अस्ति जायते वर्धते परिणाम क्षय नाश)
6-ऊर्मि (अशना पिपासा शोक मोह जरा मृत्यु)
6-कोश (त्वक् रक्त मांस मेद मज्जा अस्थि)
6-शत्रु (काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य)
3-जीव (विश्व तैजस प्राज्ञ)
3-गुण (सत रज तम)
3-कर्म (प्रारब्ध क्रियमाण संचित्)
5-कर्मेन्द्रियकर्म (वचन आदान गमन विसर्ग आनंद)
4-अन्तःकरणकर्म (संकल्प अध्यवसाय (निश्चय) अभिमान अवधारणा)
4-चित्तधर्म (मुदिता करुणा मैत्री उपेक्षा)
5-ज्ञानेन्द्रिय देवता (दिशा वायु सूर्य वरुण अश्विनीकुमार)
5-कर्मेन्द्रियदेवता (अग्नि इन्द्र उपेन्द्र यम प्रजापति)
4-अन्तःकरणदेवता (चंद्र ब्रह्मा रुद्र क्षेत्रज्ञेश्वर)
इस प्रकार ये 60 तत्त्व और पूर्वोक्त 36 तत्त्व कुल मिलाकर 96 तत्त्व हो गये।
आहत्य तत्त्वजातानां षण्णवत्यस्तु कीर्तिताः।।1/15
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