विधीयते साधु मिथः सुमध्यमे।
प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा
गुहाशयायैव न देहामानिने।।
श्रीमद्भागवत 4|3|22
श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध के तृतीय अध्याय में भगवान शिव माता सती से कहते हैं– यह सम्मुख जाना, नम्रता दिखाना, प्रणाम करना आदि क्रियाएं जो लोक-व्यवहार में परस्पर की जाती हैं; वे तत्व ज्ञानियों के द्वारा बहुत अच्छे ढंग से की जाती है। वें अंतर्यामी रूप से सबके अंतःकरण में स्थित परमात्मन्-पुरुष को ही प्रणाम करते हैं; शरीर और शरीर में अभिमान रखने वाले अहंकार को नहीं करते।
सनातन धर्मी समाज में बडप्पन का कारण धन,ऐश्वर्य, पद नहीं है।
अपने वर्ण में समान शिक्षित धनी पुरुष भी अपने वर्ण के वृद्ध पुरुष को पहले प्रणाम करता है, चाहे वह निर्धन ही क्यों न हो। यही सनातनी हिंदू समाज का शिष्टाचार है।
यदि सनातनी शिष्टाचार के विरुद्ध गर्ववश कोई व्यक्ति अपने से बड़े व्यक्ति को प्रणाम न करें तो बड़े को पहले प्रणाम नहीं करना चाहिए और ना ही उसके प्रणाम किये बिना ही उसे आशीर्वाद ही देना चाहिए।
जब बड़ा पुरुष छोटे को प्रणाम करता है या बिना प्रणाम किये ही आशीर्वाद देता है उसके ऐसा करने से छोटे का तेज, आयु, कीर्ति और लक्ष्मी का ह्रास होता है।
अतः उसे बुरा भी लगे तो भी उसके हित के लिए बड़ों को ऐसा नहीं करना चाहिए ।
जिसे प्रणाम किया जाता है उसे यह समझना चाहिए कि यह परिणाम उसके शरीर को नहीं किया गया है। यह प्रणाम उसके हृदय में स्थित परमात्मा को किया गया है। प्रणाम करने वाले को अपनी शुद्धि-अशुद्धि का विचार करना चाहिए परंतु जिसे प्रणाम किया गया है उसे प्रणाम करने वाले की शुद्धि अशुद्धि का विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रणाम वह अपने शरीर के लिए नहीं ले रहा है। यदि शरीर की दृष्टि से यह विचार करता है तो उसका अर्थ यह है कि प्रणाम उसने शरीर की दृष्टि से स्वीकार किया गया है। इससे उसके तेज की हानि होती है। प्रणाम करने पर उसे मर्यादा का पालन करते हुए आशीर्वाद देना ही चाहिए।
यह आशीर्वाद वह देह में स्थित सर्वसाक्षी की ओर से दिया जाता है ।
दोनों हथेलियों प्रणत के मस्तक पर स्थापित करके उसे आशीर्वाद देना यह आशीर्वाद की पूर्णता है। केवल मुख से आशीर्वचन का उच्चारण करना आशीर्वाद देने का संक्षिप्त रूप है।
समान व्यक्ति प्रणाम करने के बदले प्रणाम ही करते हैं।
यदि चरणों में प्रणाम करने वाला व्यक्ति श्रद्धावश कुछ क्षण चरणों में ही माथा रखे रहे तो उसे उसे उठने की प्रेरणा देना या अपने दोनों हाथों से उसे उठाना यह भी शिष्टाचार है। यदि कोई भगवान के नाम-स्मरण से अभिवादन करता है तो हमें भी उसी नाम-स्मरण से उत्तर देना चाहिए। जैसे यदि हमें राम-राम कहे तो हमें भी उसे राम-राम कह कर ही उत्तर देना चाहिये। कोई जय श्री कृष्ण कहे तो हमें भी उसे जय श्री कृष्ण कह कर ही उत्तर देना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे संप्रदाय के लोगों से व्यवहार करते समय प्रणाम आदि का ऐसा ही रूप होना चाहिए। उसे चिढ़ाने के लिये नहीं भगवन्नामोच्चार नहीं करना चाहिये।
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