गुरुवार, 2 सितंबर 2021

ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों के सोलह भेद (परम पूज्य गुरुदेव समर्थश्री जी)

परम पूज्य गुरूदेव समर्थश्री जी
ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों के सोलह भेद...
{अथातश्चत्वार आश्रमाः तेषाञ्च षोडषभेदा भवन्ति}
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ब्रह्मचारी के चार भेद=

1-गायत्रः{उपकुर्वाण}= 
उपनयन संस्कारानन्तर त्रिरात्रपर्यंत लवणरहित आहार कर गायत्री जपासक्त रहने वाले ब्रह्मचारी को गायत्र कहा जाता है।

2-ब्राह्मणः=
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक {प्रत्येक वेदाध्ययन् हेतु 12×4=48वर्ष के योग से} वेदाध्ययन करने वाला ब्रह्मचारी ब्राह्मण कहलाता है। अथवा 24 वर्ष तक गुरुकुलवासी ब्राह्मण कहाता है।

3-प्राजापत्यः
48 वर्ष तक गुरुकुलवास करने पर प्राजापत्य संज्ञा होती है।अथवा केवल स्वदार में ही निरत, केवल शास्त्राज्ञानुरूप विहित तिथि में ही ऋतुकालाभिगामी तथा सर्वदा सर्वथा परदारवर्जी को प्राजापत्य ब्रह्मचारी कहा जाता है।

4-बृहन् {नैष्ठिकः}=
आजीवन गुरुकुल की मर्यादा में रहकर निजाश्रमोचित शास्त्रीयानुशासन को मानने वाले नैष्ठिक अथवा बृहन् कहे जाते हैं।
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गृहस्थी के चारभेद...

1-वार्ताकवृत्तयः=
कृषि गोरक्षा तथा अगर्हित अनिन्दित {शास्त्रनिषेधमुक्त}व्यापार द्वारा न्यायोचित अर्थाजन से स्वाहा स्वधा तथा पंचमहायज्ञादि पूर्वक आत्मकल्याण में प्रवृत्त सदाचारी गृहस्थ को वार्ताकवृत्ति कहा जाता है।

2-शालीनवृत्तयः=
जो वेदाध्ययन् करके वृत्यर्थ पढाते नहीं।स्वयं यजमान बनकर यजन तो करते हैं परन्तु आचार्य बनकर यजन नहीं कराते।
यथाशक्ति नित्य दान तो करते हैं परन्तु प्रतिग्रह{दान}नहीं लेते।निरन्तर परमार्थ साधन में लगे रहते हैं।

3-यायावराः=पर्यटनशीलाः
जो पठन पाठन यजन याजन दान प्रतिग्रह आदि षट्कर्म करके आत्मज्ञान हेतु साधनरत रहते हैं।

4-घोरसंन्यासिकाः= सर्वथा संग्रह परिग्रह प्रतिग्रहशून्य अश्वस्तनिक कल की चिन्ता न करने वाले साधक दम्पती,
जो जल तक की शुद्धता का विशेषविचार कर पवित्रजल से क्रिया सम्पादन कर,प्रतिदिवसीय उञ्छवृत्ति से संकलित धान्य द्वारा जीवन निर्वाह कर आत्मज्ञान में निरत होते हैं।
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वानप्रस्थी के चार भेद...

1-वैखानसाः=विखनसं ब्रह्माणं वेत्ति तपसा
वनक्षेत्र में समुत्पन्न{अग्रामोद्भूत}अकृष्टपच्य अहल्यभूम्युत्पन्न{बिना हल चलाये ही उपजे हुए अन्न}औषधि वनस्पति आदि द्वारा पञ्चयज्ञादि सम्पन्न कर आत्मकल्याण में निरत वानप्रस्थी को बैखानस कहा जाता है।

2-उदुम्बराः= औदुम्बरेण जीवन्तीति

प्रातः जगते ही जिस दिशा में भाव बने चल पडे और दैनिककृत्य सम्पन्न कर वहां से गूलर बेर नीवार सामकादि साधन लाकर अग्निचर्या पूर्ण कर पंचमहायज्ञ करके,आत्मकल्याण में लगे रहने वाले औदुम्बर होते हैं।

3-बालखिल्याः=प्राणोपमाःतपसि निरताः अतिसूक्ष्माः ब्रह्मणो रोमेभ्योत्पन्ना वा

जटा चीर मृगचर्म वल्कल {वृक्षत्वक्}धारी आषाढ पूर्णिमा से कार्तिकपूर्णिमा {चातुर्मास} तक फलमूलाशी होकर रहने वाले,शेष आठ मास तक वृत्युपार्जन करके पंचमहायज्ञादि करते हुए आत्मकल्याण साधन करने वाले बालखिल्य कहे जाते हैं।

4-फेनपाः=फेनं पिबन्तीति अल्पाहारसूक्ष्माहारसेविनः

उन्मत्तवत् सूखे गिरे हुए पत्ते फलादि खाते हुए,यत्रकुत्रापि एकान्तवास करते यथासंभव पंचमहायज्ञ करते हुए अग्निचर्या सम्पन्न करके आत्मकल्याण में निरत फेनप कहे जाते हैं।
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सन्यासी के चार भेद...

1-कुटीचराः=कुट्यां चकते/चरते वा इति कुटीचकः

 स्वजनों के द्वारा प्राप्त भिक्षा से प्रसन्न निश्चित कुटिया में रहकर आत्मानुसंधानरत संन्यासी को कुटीचक कहा जाता है।

2-बहूदकाः= बहूनि उदकानि शौचांगतया यस्य सः ते

त्रिदण्डी कमण्डलु छींका जल कुशा पादुका आसन शिखा सूत्र कौपीन काषायवेषधारी,विप्रकुलात भिक्षाव्रती, आत्मानुसन्धानकर्ता संन्यासी  बहूदक कहाते हैं।

3-हंसाः= नीरक्षीरविवेकीहंसवत् नित्यानित्यवस्तुविवेकशीलाः

एकदण्डी सूत्रशिखारहित {शिखावर्जिताs यज्ञोपवीतधारिणः} कमण्डलुधर,ग्राम में एकरात्रि मात्र रहने वाले,नगर या तीर्थ में पंचरात्र रहने वाले,निरंतर एकरात्रव्रत द्विरात्र व्रत कृच्छ्रव्रत अथवा चांद्रायणादि करते रहने वाले,आत्मानुशीलनरत संन्यासी हंस कहे जाते हैं।

4-परमहंसाः=हंसेभ्योपि पराः इति
अव्यक्तलिङ्गा दण्डादिरहित चंदन माला उपासनापद्धति वस्त्रादि से भी ज्ञात न होने वाले आचार विचार सम्पन्न शून्यागार देवागार निवासी धर्माधर्ममुक्त विधिनिषेध से पार समलोष्टाश्मकांचन सर्वत्र भिक्षाचारी ब्रह्मवित् महात्मा परमहंस कहे जाते हैं।

स्रोत..आश्रमोपनिषत्..
परम पूज्य गुरूदेव
समर्थ श्री जी

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