मंगलवार, 8 मार्च 2022

है कितना गौरवशाली पद वसुधा में हिंदू नारी का

सुख में, दुख में, रण में, बन में
छाया पति की बन जाती है;
अपनी कोमल उंगलियों को 
रथ चक्के की कील बनाती है;

काली-सी मतवाली बनकर
अरिदल का रक्त बहाती है;
अन्यायी आताताइयों की 
दल देती पल में छाती है;
 
स्वागत करती बाणों, प्राणों से
 बरछी और कटारी का 
है कितना गौरवशाली पद
वसुधा में हिंदू नारी का ।। 1 ।।  

जिसके उज्जवल तप के आगे
झुक जाया करता इंद्रासन,
लख जिसका अनुपम शौर्य 
डगमगाने लगते हैं सिंहासन;
 
पृथ्वी पर गिरते राजमुकुट
लख करके जिसका वीरासन,
है मिट जाता वसुधापरसे 
अन्यायी क्रूर कुटिल शासन;

 थक जाता दस सहस्र गज बल,
 पर अन्त न मिलता सारी का।
 है कितना गौरवशाली पद 
 वसुधा में हिंदू नारी का ।। 2 ।। 
 
पाताल-लोक भूगोल तथा वह—
स्वर्गलोक जल जाता है,
क्रोधानल से जिसके क्षण में
रबि-शशि-मंडल झुलसाता है;
 
तारक, विद्युत, बादल का क्या—
कहना जब नभ थर्राता है;
सागर गिरि सरिता मरू—
समीर का चिह्न ना रहने पाता है;

 जिसके चरणों पर झुका शीश 
 यमपुर के भी अधिकारी का।
 है कितना गौरवशाली पद
 बसुधा में हिंदू नारी का।। 3।।
  
रण में जाकर डट गई कभी
अरिदल को मार भगाने को,
चंडी का प्रबल प्रचण्ड तेज
दुनिया को याद दिलाने को;

या झटपट उद्यत हुई स्वयं ही
अनल ज्वाल धधकाने को
लपटों में जा छिप गई कभी
जो अपना धर्म बचाने को;

इसके ही कारण मान बढ़ा
जोहर-व्रत की चिंगारी का।
है कितना गौरवशाली पद 
बसुधा में हिंदू-नारी का ।।4।।

(विलक्षण)

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

महाशिवरात्रि शिवार्चन विधि एवं शुभ मुहूर्त

 महाशिवरात्रि पर विशेष लेख

मंगलवार 1 मार्च 2022 1 मार्च 2022

आचार्य पंडित रोहित वशिष्ठ

सिद्ध पीठ श्री बगलामुखी मंदिर ब्रह्मपुरी कॉलोनी ,पेपर मिल रोड सहारनपुर ,
मो.न.
96900 66000,
9897191499

भगवान शिव को अत्यंत प्रिय महाशिवरात्रि कही गई है ।
भगवान शिव के अवतरण के मंगल सूचक के रूप में इस व्रत को किया जाता है।
महाशिवरात्रि को ही भगवान शिव  इस भूमंडल पर निराकार से साकार रूप में ब्रह्मा और विष्णु जी के सम्मुख करोड़ों सूर्य के प्रकाश के समान शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे । सनातन शिव भक्तों में यह व्रत

 " व्रतराज " के नाम से विख्यात है। भगवान के निष्काम और सकाम भक्त इस व्रत को जीवनपर्यंत करते हैं । भगवान शिव भोग और मोक्ष दोनों को देने वाले हैं। जिन्हे  सांसारिक विषय वासनाओं से मुक्ति चाहिए उन्हे  तो यह व्रत करना ही चाहिए  साथ ही साथ सांसारिक सुख चाहने वाले भी शिवरात्रि का व्रत अवश्य करना चाहिए।

इस वर्ष की महाशिवरात्रि का विशेष योग

मंगलवार  धनिष्ठा नक्षत्र,   परिघ व शिव योग  इस वर्ष की महाशिवरात्रि को विशेष बना रहें हैं।
इस प्रकार के योग में शिवार्चन करने से शत्रु शमन होता है तांत्रिक क्रियाओं से निवृत्ति होती है। शत्रु पराभव को प्राप्त होते हैं।

प्रत्येक सनातन धर्मी को प्रयत्नपूर्वक महाशिवरात्रि का व्रत  करना चाहिए ।जो व्यक्ति पूरे वर्ष भगवान शिव की पूजा नहीं कर सकता। वर्ष में केवल एक दिन  महाशिवरात्रि पर व्रत एवं पूजन करने से  एक वर्ष तक  किए गए शिवपूजन का फल उसे प्राप्त हो जाता है।

महाशिवरात्रि पर इस बार ग्रहों का विशेष योग बन रहा है । 12 वें भाव में मकर राशि में पंचग्राही योग बनेगा । इस राशि में मंगल और शनि के साथ बुध, शुक्र और चंद्रमा रहेंगे । लग्न में कुंभ राशि में सूर्य और गुरु की युति बनी रहेगी । चौथे भाव में राहु वृषभ राशि में रहेगा, जबकि केतु दसवें भाव में वृश्चिक राशि में रहेगा।

महाशिवरात्रि के दिन सुबह 11.47 से दोपहर 12.34 तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा । इसके बाद दोपहर 02.07 से लेकर 02.53 तक विजय मुहूर्त रहेगा । पूजा या कोई शुभ कार्य करने के लिए ये दोनों ही मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ हैं । शाम के समय 05.48 से 06.12 तक गोधूलि मुहूर्त रहने वाला है ।

कैसे करें महाशिवरात्रि व्रत
महाशिवरात्रि के व्रत में शिव पूजन, शिव मंत्र का जप, रात्रि के चार पहर की पूजा एवं जागरण को विशेष माना गया है।

प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करे । भगवान शिव की पूजा में गले में रुद्राक्ष की माला, माथे पर भस्म या चन्दन का त्रिपुंड और मुख में भगवान शिव का नाम यह विशेष फल देने वाले कहे गये है। शिव पूजन करने से पूर्व अपने शरीर पर रूद्राक्ष मस्तक पर भस्म  और जिह्वा पर शिव नाम अवश्य धारण करना चाहिए । हाथ में जल लेकर सर्वप्रथम महाशिवरात्रि व्रत रखने का संकल्प करें ।भगवान से प्रार्थना करें कि हे शिव आपकी प्रसन्नता के लिए मैं महाशिवरात्रि का व्रत कर रहा हूं मेरे इस व्रत को आप पूर्ण करने की कृपा करें ।
इस प्रकार मानसिक संकल्प कर  शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।
यदि संभव हो तो किसी वेद मंत्रों के जानने वाले ब्राह्मण के माध्यम से शिवपूजा करनी चाहिए। यदि ऐसा न हो सके तो स्वयं ही पूजा करनी चाहिए ।
भगवान शिव की पूजा भगवान शिव के नाम अथवा मंत्र से करनी चाहिए ।
भगवान शिव का सबसे सर्वोत्तम और सरल मंत्र " नमः शिवाय " है। जो व्यक्ति यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकारी है और यज्ञोपवीत धारण करता है उसे " ओम नमः शिवाय " बोलना चाहिए ।
अन्य सभी को " नमः शिवाय " कहकर शिव पूजन करना चाहिए।
  स्त्रियाॅं " शिवाय नम:" का जप करें।



  

धर्म कार्य सदैव धर्मशास्त्रों को आधार बनाकर ही करना चाहिए। मनमाने ढंग से की गई पूजा का फल तो मिलता ही नहीं साथ ही पाप का भागी भी बनना पड़ता है।  सनातन नियमों का पालन करते हुए ही भगवान शिव की आराधना एवं पूजन करना चाहिए।
शिवपूजन से पूर्व श्री गणेश,मां पार्वती,श्री नंदी,कार्तिक,कुबेर,कीर्तिमुख,गंगा,यमुना,सरस्वती एवं नाग आदि शिव गणों की पूजा की जाती है। शिव गणों की पूजा करने के पश्चात ही भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए ।
प्रत्येक वस्तु को अर्पण करते समय अपने अधिकार के अनुसार पंचाक्षर मंत्र जप करना चाहिए।
भगवान शिव का जल से अभिषेक करना चाहिए। उसके पश्चात भगवान शिव को दूध ,दही, गाय का घी, शहद ,शक्कर इनसे अलग अलग या इन पांचों को एक साथ मिलाकर  शिवलिंग पर अर्पण करें ।उसके पश्चात भगवान शिव को गंगाजल से स्नान कराएं । भगवान शिव को वस्त्र अर्पण कर एक जनेऊ भी अर्पण करे।  भगवान शिव को चंदन का तिलक करें  बिना टूटे साबुत चावल शिवलिंग पर चढ़ाएं । भगवान को पुष्प व  पुष्पमाला चढ़ाएं । बेलपत्र अर्पण करें, बेलपत्र तीन की संख्या में होने  चाहिए। भांग धतूरा  भी चढ़ाना चाहिए ।भगवान को धूप दीप दिखाएं। भगवान को भोग लगाएं भगवान को फल और पान अर्पण करें साथ ही भगवान शिव को दक्षिणा भी अर्पण करें । इस इस प्रकार भगवान शिव की यह पूजा पूर्ण होती हैं। प्रदोष काल में शिव मंदिर में जाकर पहले पहर की पूजा करनी चाहिए।
ऊपर बताई गई विधि से ही शिव पूजन करना चाहिए ।
रात्रि में चार पहर की पूजा करने के पश्चात अगले दिन प्रातः काल स्नान करके पुनः भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए इस प्रकार अलग अलग समय में पूजन करके रात्रि में जागरण करके भगवान शिव की पूजा करने से पूरे वर्ष किए जाने वाले शिव पूजन एवं जप का फल एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है। विधि पूर्वक भगवान की गई भगवान शिव की पूजा मनोवांछित फल को प्रदान करती है।
शिव पूजन का शुभ मुहूर्त

मंगलवार 1 मार्च 2022
प्रातः 4:10 से 6:47 तक
उसके पश्चात
प्रातः 9:40 से दोपहर  1:59 तक
उसके पश्चात

चार प्रहर की पूजा  का समय 

पहले पहर की पूजा
सायं 6:30 से 9:30 तक
दूसरे पहर की पूजा
रात्रि 9:30 से 12:30 तक
  तीसरे पहर की पूजा
  रात्रि 12:30 से 3:30 तक
  चौथे पहर की पूजा
  प्रातः 3:30 से 5:30 तक
©आचार्य पंडित रोहित वशिष्ठ

सोमवार, 17 जनवरी 2022

शाकम्भरी देवी की कथा


दुर्गम नाम का एक दैत्य था। हिरण्याक्ष के वंश में वह पैदा हुआ था और उसके पिता का नाम रुरु था। वो देवताओं से शत्रुता रखता था और देवताओं को कष्ट देने के लिए उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप आरम्भ कर दिया। तपस्या का फल देने आए ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब उस दैत्य ने ब्रह्मा जी से कहा सारे वेद मंत्र मेरे आधीन हो जाए। ब्रह्मा जी उसे तपस्या का वरदान देते हुए अंतर्ध्यान हो गए।

उस दैत्य को पता था कि देवताओं की शक्ति वेद मंत्र है। ब्राह्मण जब वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुये अग्नि में आहुति देते हैं उसी आहुति से देवताओं की शक्ति बढ़ती है। उस दैत्य ने वेद मंत्रों को छुपा दिया। वेद मंत्रों के अदृश्य हो जाने पर ब्राह्मण वेद मंत्रों को भूल गए। संध्या, देव पूजा, पितृ तर्पण आदि के आभाव में ब्राह्मण वैदिक मार्ग से भ्रष्ट हो गए। ब्राह्मणों के धर्म विहीन हो जाने पर देवताओं की शक्ति समाप्त हो गई।  तब उस दैत्य ने स्वर्ग पर आक्रमण किया और शक्तिहीन देवता स्वर्ग त्याग कर हिमालय की कन्दराओं में छुप गये।

देवताओं के शक्ति हीन हो जाने पर पृथ्वी भी वैभवहीन हो गई। अन्न जल सब विलुप्त होने लगा। १०० वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणी भूख प्यास से व्याकुल होकर प्राण छोड़ने लगे। ब्राह्मणों ने विचार किया विपत्ति में भगवती ही अपने भक्तों की रक्षा करती है। ब्राह्मणों ने भी हिमालय में जाकर भगवती जगदंबा का स्मरण किया। आंखों से आंसू बहाते हुए भाव विह्वल होकर भगवती को पुकारना आरम्भ किया। देवताओं और ब्राह्मणों की करुण पुकार सुनकर भगवती जगदंबा प्रकट हो गई देवता और ब्राह्मणों को दीन व दुर्बल देखकर भगवती को बड़ा दुख हुआ। भगवती ने अपने शरीर में हजारों नेत्र प्रकट किए। जिस प्रकार संसार की साधारण माता अपने बच्चों को भूखा प्यासा देखकर दुखी होती है और उसकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं उसी प्रकार जगदंबा के नेत्रों से आंसू टपकने लगे। ९ दिनों तक लगातार अश्रु प्रवाह होने के कारण पृथ्वी जलयुक्त हो गई।
भगवती को भाव विह्वल देख कर देवताओं ने और ब्राह्मणों ने जगदंबा को शताधिक नेत्र वाली जानकर "शताक्षी" - इस नाम से संबोधित करते हुए स्तुति कर भगवती जगदंबा को प्रसन्न किया। भगवती प्रसन्न होकर कहने लगी "वरदान मांगो।" तब ब्राह्मणों ने कहा - "माँ भूख लग रही है।" तब जगदंबा ने अपने शरीर से शाक-भाजी प्रकट कर ब्राह्मणों की भूख प्यास को मिटाया। भगवती के शरीर से शाक प्रकट होने के कारण भगवती का नाम "शाकम्भरी" पड़ा। इस प्रकार भगवती जगदंबा शताक्षी और शाकंभरी बनकर देवताओं और मनुष्य के कष्ट को दूर करती है। 

भूख प्यास दूर हो जाने पर देवता और ब्राह्मण प्रसन्न हो गए। बच्चों के प्रसन्न होने पर मां भी प्रसन्न हो गई और मां जगदंबा ने देवताओं से कहा - "मैं तुम्हारे लिए और क्या करूं?" तब देवताओं ने कहा - "माँ! दुर्गम दैत्य का संहार कर हमें सुख प्रदान करो।" तब भगवती दैत्य दुर्गम का वध करने के लिए अपने शरीर से दस महाविद्याओं को प्रकट किया। युद्ध करने आयें दुर्गम दैत्य का भगवती ने वध कर दिया। उस दैत्य के मरते ही वह छुपे वेद प्रकट हो गए। उन वेदों को ब्राह्मणों को देकर,भगवती देवताओं और ब्राह्मणों को अभयदान देकर अंतर्ध्यान हो गई। जय माँ शाकम्भरी

गुरुवार, 25 नवंबर 2021

अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा  काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराने के उपरांत अहिल्याबाई होल्कर से मिलने में काशी से एक विद्वान ब्राह्मण आयें। अहिल्याबाई ने उन्हे ससम्मान राजदरबार में बुलवाया। 
विद्वान ब्राह्मण के हाथ में रेशमी वस्त्र में एक पुस्तक थी। उन ब्राह्मण ने वह पुस्तक महारानी की ओर बढ़ाते हुये कहा― हे महारानी आपके द्वारा सनातन धर्म के प्रति किये गये कार्यों से प्रभावित होकर मैनें आपके सम्मान में संस्कृत पद्यों से युक्त एक ग्रन्थ की रचना की है, जिसे मैं आपको समर्पित करनें आया हुँ। अहिल्याबाई उदास मन  होकर  कहने लगी– इन ब्राह्मण को पारितोष के रूप में स्वर्ण मुद्राएं दी जाये। 
 कोषाध्यक्ष मुद्राओं से भरी थैली लेकर उपस्थित हुआ। महारानी अपने हाथ से स्वर्ण मुद्राएं ब्राह्मण को देने लगी तो ब्राह्मण ने कहा- आप अप्रसन्न मन से मुझे स्वर्ण मुद्राएं दे रही है इसका कारण ?
अहिल्या बाई होल्कर ने कहा- हे ब्राह्मण आप संस्कृत के विद्वान है, ज्ञानी है और काशी में निवास करते है यह प्रसन्नता की बात है  लेकिन आपने अपनी विद्वता और ज्ञान का  उपयोग  इस तुच्छ महिला के महिमामंडन में किया यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। आप अपने इस ज्ञान से अपनी विद्ववत्ता पूर्ण वाणी से भगवान विश्वनाथ की स्तुति करते तो निश्चय ही मुझें प्रसन्नता होती। 
ब्राह्मण को बिदा कर अहिल्याबाई होल्कर ने सेवको को बुलाकर कहा कि बडे भारी पत्थर के साथ इस पुस्तक को बांधकर नर्मदा के गहरे जल में इसे डुबा दो।
सेवकों ने ऐसा ही किया।
ऐसी भगवद्भक्ता भगवत परायण सनातन धर्म की सेवा करने वाली अहिल्याबाई होल्कर को कोटि कोटि नमन।

रविवार, 7 नवंबर 2021

नास्तिक_और_आस्तिक

#नास्तिक_और_आस्तिक
आचार्य रोहित वशिष्ठ
7नवम्बर2021

भारत के मूर्धन्य वैज्ञानिक, नोबेल पुरस्कार विजेता, भारत रत्न  #चंद्रशेखर_वेंकटरामन् अत्यंत व्यस्त होते हुए भी ईश्वर की आराधना और अपने कुल के अनुरूप धर्माचरण में प्रतिदिन कुछ समय अवश्य देते थे ।
एक बार जब वे संध्यावंदन करके उठे तो एक अन्य  भारतीय वैज्ञानिक, जो उनसे मिलने आया था और ईश्वर में विश्वास नहीं रखता था,  कहने लगा – श्रीमान! आप वैज्ञानिक होकर भी ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं , जो विज्ञान से प्रमाणित नहीं हैं। आप प्रतिदिन धर्म-कर्म के लिए आधा घंटा नष्ट कर देते हैं, किस प्रयोजन से?
 वैंकटरामन् ने उत्तर दिया अपना परलोक सुधारने के लिए । मृत्यु के बाद सद्गति हो इसलिए ।
नास्तिक वैज्ञानिक ने बड़ी उपेक्षा से उत्तर दिया कहाँ है परलोक ?  मृत्यु के बाद क्या होगा किसने देखा है ? आपको मालूम है क्या ? ईश्वर कहीं है क्या ? आपने देखा है क्या ?
 
वेंकटरामन् ने  शालीनता से कहा बंधु मैं भी वैज्ञानिक हूं और यह मानता हूं कि न तो ईश्वर को किसी ने देखा है , न हीं इस बात पर मुझे विश्वास है कि परलोक है और मृत्यु के बाद ऐसे धर्म-कर्म से कोई स्वर्ग जा सकता है । 
 मैं मानता हूँ कि सत्यापित किए बिना किसी बात को अंधानुकरण के रूप में नहीं मानना चाहिए ।

अब मैं आपसे पूछता हूँ  कि क्या आपने आपके  विज्ञान ने यह सत्यापित कर दिया है कि  ईश्वर नहीं है ? क्या यह निश्चित कर लिया है कि मृत्यु के बाद यह होगा , और यह नहीं होगा ।

नास्तिक वैज्ञानिक ने उत्तर दिया― यह सभी बातें अनिश्चित हैं । प्रमाणित नहीं । आप भी उन्हें मानने लगे ?  कौन कह सकता है कि ईश्वर है या नहीं ? मृत्यु के बाद क्या होगा ? 

 श्री वेंकटरामन्  जी ने कहा कि ' यह सच है यह बात बिल्कुल अनिश्चित हैकि  ईश्वर का , परलोक का , पुनर्जन्म का , मृत्यु के बाद की गति का कोई अस्तित्व  भी है या नहीं ― यह सब संभावना मात्र हैं ।  हो सकता है कि यह नहीं हों , यह भी हो सकता है कि यह हों । 

यदि यह सब मिथ्या है और नहीं है तो प्रतिदिन मेरा आधा घंटा धर्माचरण में व्यर्थ नष्ट हुआ माना जाएगा ।
कोई बात नहीं कभी-कभी व्यर्थ के काम में भी कुछ समय नष्ट हो जाए तो अनर्थ नहीं हो जाता ।

पर कल्पना करो कि यदि यह सब सत्य हो , वास्तव में हो । तो क्या होगा ? 
 यदि इस संभावना के नाम पर हम अपने आप को किसी दैनिक नियम से बांध लें तो क्या बुरा है ?
 यदि इसके बिना परलोक में दुर्गति की स्थिति हुई तो आपका क्या होगा ?
 उस नास्तिक वैज्ञानिक के पास इसका कोई उत्तर नहीं था । हो भी नहीं सकता ।
वासुदेवकल्याणम्

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

रावण व कुम्भकर्ण संवाद

कुम्भकर्ण ने रावण से कहा-भाई स्त्री स्वभावतः भीरू होती हैं। सीता को भय दिखाकर अपनी पत्नी बना लेते ।
रावण बोला- भाई मैने ऐसा किया था। जब मैने उस सीता को अपनी चन्द्रह्रास खड्ग से भयभीत करना चाहा तो उसने एक तृण दिखाकर मुझे ही भयभीत कर दिया।
कुम्भकर्ण ने कहा-उसे धनादि का लोभ देते।
रावण ने कहा-मैने उसे प्रधान रानी होने का लोभ दिया लेकिन उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। 
कुम्भकर्ण पुनः बोला- भाई तुम तो मायावी हो। अरे राम रूप धरकर उसके पास जाते तो निश्चय ही वो तुम्हें प्राप्त हो जाती।
रावण ने कहा - ऐसा मैनें किया था लेकिन जैसे ही मैनें रामरूप धारण किया मन्दोदरी और अन्य रानियों के अतिरिक्त जिस भी स्त्री को निहारता उसमें मुझे अपनी  माँ केकशी नजर आती।
कुम्भकर्ण ने कहा - राम विग्रहवान धर्म है
रावण तुम्हारी और राम की कौई बराबरी नहीं ।
विभीषण की भाति ही तुम्हें भी धर्म की शरण ग्रहण करनी चाहिये।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?

वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?
आचार्य रोहित वशिष्ठ
10अक्टूबर 2021
वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?
अपने मत से पूर्व हमें  शास्त्रमत का अवलोकन अरना आवश्यक है।
इस विषय में धर्मशास्त्र का क्या मत है आईये जानते है।इस लेख के माध्यम से
कुछ आधुनिक हिंदुओं का कहना है कि " वर्ण व्यवस्था तो हम मानते हैं; क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने भी कहा है कि चतुर्वर्ण की सृष्टि मैंने की है। पर चतुर्वर्ण से भगवान का अभिप्राय जन्मना जाति मानने वाली व वर्तमान व्यवस्था नहीं है,  किंतु वह व्यवस्था है जिसमें मनुष्य के गुण व कर्म के अनुसार उसका वर्ण निश्चित होता है।
भगवान ने स्पष्ट ही गुणकर्मविभागशः कहा है " ।
अतः इन लोगों का मत है कि जन्मना जाति मानने वाली वर्तमान पद्धति को हटा देना चाहिए और वही प्राचीन व्यवस्था जिसका निर्देश भगवान ने किया है  अर्थात मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसके अनुसार उसका वर्ण निश्चित करने वाली व्यवस्था फिर से स्थापित करनी चाहिए। तभी हमारे समाज के अंदर सच्चे और अच्छे लोग ब्राह्मण कहलाएंगे और ऐसी वर्ण व्यवस्था से समाज का कल्याण  होगा । वर्तमान व्यवस्था में केवल ब्राह्मण कुल में जन्म हो जाने से ही ऐसे-ऐसे लोग ब्राह्मण कहलाते हैं जिनमें जरा भी योग्यता नहीं है। इससे बहुत बड़ी हानि हुई है।  हम लोगों का राजनीतिक दासत्व इसी का परिणाम है।  इसी से सब बुराइयां उत्पन्न हुई है। जिससे हिंदू समाज त्रस्त है।

इस लेख को पढने से  निश्चय ही यह समझ में आ जाएगा कि भगवान श्रीकृष्ण या श्रीमद्भगवतगीता का यह अभिप्राय नहीं है कि किसी मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसका वर्ण निश्चित किया जाए;   बल्कि उन्हें यही बतलाना है कि किसी की  जाति उसके जन्म से ही जाननी चाहिए। जन्मना जाति की व्यवस्था पर जो अन्य आक्षेप किये जाते हैं,  वे किस प्रकार निराधार हैं।

1. यदि किसी मनुष्य की जाति उसकी वृत्ति या  कर्म पर निर्भर होती तो द्रोणाचार्य क्षत्रिय कहलाते ब्राह्मण नहीं क्योंकि उनका व्यवसाय युद्ध करना था। 
पर जन्म के कारण ही वह ब्राह्मण थे।

2. उनके श्यालक (पत्नी के भाई)  कृपाचार्य योद्धा होने पर भी ब्राह्मण थे क्योंकि ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ था।

3.  अश्वत्थामा में ब्राह्मण के न तो कोई गुण थे उनके कर्म ही ब्राह्मण के अनुकूल थे। वे तो  इतने क्रूर थे कि रात में पांडवों के शिविर में घुसकर सोते हुए द्रोपती के बच्चों का उन्होंने कत्ल कर डाला।  उत्तरा के गर्भस्थ बालक पर भी उन्होंने अति भयंकर बाण चलाया । फिर जब फिर भी जब भी पकड़े जाते हैं तब यही निश्चित किया गया है अश्वत्थामा का वध नहीं हो सकता; कारण भी बताया कि अश्वत्थामा जन्मना  ब्राह्मण है।  इसलिये अपराधी होते हुये भी उन्हे प्राण दण्ड न देकर सिर-मूँछ मुडाकर देश निकाला दे दिया गया ।
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद् गौरवेन च।।
महाभारत सौप्तिक पर्व 16|32

गुण कर्म के अनुसार किसी मनुष्य का वर्ण निश्चित करने में एक बहुत बड़ी बाधा है।
 प्रायः ऐसा देखने में आता है कि किसी मनुष्य के गुण तो उसे एक वर्ण का बतलाते हैं पर उसका कर्म दूसरे ही वर्ण का होता है ऐसी अवस्था में उसका वर्ण कैसे निश्चित किया जाएगा। फिर किसी मनुष्य के गुणों की पहचान करना भी बहुत कठिन है। बाह्य स्वरूप से गुणों का ठीक ठीक पता नहीं चलता अक्सर धोखा हो जाता है। ऐसा हो सकता है कि बाहर से देखने में कोई मनुष्य बहुत उग्र और रुखा हो पर उसका हृदय अत्यंत कोमल और उदार हो । ऐसा भी हो सकता है कि कौई व्यक्ति  वाणी बहुत मधुर हो पर हृदय से अत्यंत कठोर ।  एक ही मनुष्य में गुण-दोष के अवलोकन करने  में मतभेद भी हो सकता है उस व्यक्ति के मित्र कहेंगे कि अमुक व्यक्ति अत्यंत सज्जन है शत्रु कहेंगे वह महादुर्जन है। चलो यह भी मान लिया जाए कि गुणों का पता लोग परख ही लेगें तो भी इस बात क्या भरोसा कि उसके वे गुण उस व्यक्ति में आजीवन बने रहें। अक्सर देखने में आता है सज्जन व्यक्ति में दुर्जनता का भाव  उत्पन्न हो जाता है और  दुर्जन व्यक्ति को  सज्जन बनते देर न लगती। ऐसी स्थिति में  गुण और कर्म से जाति का निर्धारण कैसे हो सकता है।

कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में अर्जुन ने कहा मैं युद्ध नहीं करूंगा भिक्षा मांगकर जी लूंगा।  यदि गुण और कर्म से ही जाति निश्चित हो जाती तो फिर भगवान श्री कृष्ण को गीता का उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ती।  अर्जुन में ब्राह्मणों के वे सभी गुण थे जिसका गीता जी में उल्लेख किया गया है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।
शम, दम, तप, शुचिता, क्षमा, आर्जव, ज्ञान-विज्ञान आस्तिकता   ये  सब ब्राह्मणों के स्वाभाविक गुण है। भिक्षावृत्ति ब्राह्मण की है।
गुणकर्म के अनुसार अर्जुन को ब्राह्मण ही होना चाहिये फिर युद्ध न करने से उसे कौन सा पाप लगता ।
लेकिन भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि यदि तुम युद्ध नहीं करोगे तो तुम्हें पाप लगेगा।
 श्रीकृष्ण का ऐसा कहना तो तभी युक्तिसंगत हो सकता है जब जन्मना जाति मानने की ही व्यवस्था हो क्योंकि अर्जुन जन्म से क्षत्रिय है।  क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना यदि अर्जुन युद्ध नहीं करता तो वह अपने धर्म की अवहेलना करता है और पाप का भागी होता है।
जब जन्मजात वर्ण से कर्म और धर्म निश्चित होता है तभी कोई मनुष्य जो चाहे वह कर्म नहीं कर सकता ।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र ही प्रमाण हैं। 
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

शास्त्रों में सबसे पहले वेद है। ये ही सब शास्त्रों के आधार हैं।  ऋग्वेद संहिता के 10|90 (पुरुष सूक्त) में तथा तैत्तिरीय संहिता के 7|1|1 में बताया गया है कि चार वर्ण प्रजापति ब्रह्मा के चार  अंगों से उत्पन्न हुए हैं। 
छान्दोग्योपनिषद के 5|10|7 में यह वर्णन है कि जो लोग पुण्य कर्म करते हैं,  वे  दूसरे जन्म में ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य  कुल में जन्म लेते हैं और जो पाप कर्म करते हैं में चांडाल आदि योनियों में प्राप्त होते हैं। 
रमणीय चरणा रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मण योनिं वा क्षत्रिय योनिं वा वैश्ययोनिं वा। कपूय चरणाः कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डाल योनिं वा।

मनुस्मृति का वचन है
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु ।
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त एव हि।।
मनु.10|5 
सब वर्णो की अक्षत-योनि तुल्य पत्नियों में गर्भाधान करने से जो संतान हो, उन्हे अनुलोम क्रम से उन्ही वर्णों की जानना चाहिये।ब्राह्मण पतिपत्नी से उत्पन्न संतान ब्राह्मण, क्षत्रिय पति पत्नी से उत्पन्न संतान क्षत्रिय वैश्य पति पत्नी से उत्पन्न संतान वैश्य इस प्रकार जानना चाहिये।

हारीत संहिता का वचन है-
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैवमुत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः। 1|15
ब्राह्मणी में ब्राह्मण से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण ही कहा गया है।

अत्रि संहिता का वचन है- 
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय संस्काराद् द्विज उच्यते। 1|40
जन्म से ब्राह्मण जाना जाता है संस्कार होने पर द्विज-संज्ञा होती है।

गीता में गुणकर्मविभागशः कहने का अर्थ
यहाँ कर्म कहने का अर्थ वृत्ति या जीविका नहीं कर्तव्य है.
कर्म विभाग का अर्थ है विभिन्न वर्णों के कर्तव्य ।
गुण का अर्थ त्रिगुण सत्व रज और तम से है। गुण विभाग जन्म के साथ लगे हुये गुणों के अनुसार मनुष्यों का वर्गीकरण है।

कर्मणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवैर्गुणैः।
गीता 18|41
स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार कर्मो का विभाग हुआ है।
यहाँ " स्वभाव प्रभव " का भाव यही है कि   जन्मजात गुणों  के द्वारा ही वर्ण निश्चित होता है।

अब प्रश्न यह है कि विश्वामित्र क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर ब्राह्मण वर्ण में कैसे परिवर्तित हुयें?
उत्तर है तप से ।
कर्म से नहीं तप से 
यह बात विश्वामित्र जी भी जानते थे कि कर्म से ब्राह्मण बनना सम्भव ही नहीं है अतः उन्होने तप करने का निश्चय किया। 
कितने वर्ष तप किया?
हजारों वर्ष तप किया ?
तप का अर्थ ही है शरीर को तपाना ।
केवल  तप में ही वह शक्ति है जो शरीर के परमाणु बदल सकें। 
वर्ण का सम्बन्ध जन्मजात शरीर से है।
अब  तप के द्वारा शरीर के परमाणु बदले या नहीं इस बात का परीक्षण करना केवल वशिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षियों  के द्वारा ही सम्भव है। यही कारण है कि  ब्रह्मा जी ने उन्हे कह दिया था कि वशिष्ठ जी के अनुमोदन के बिना इस शरीर में ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असंभव है।

महाभारत के वनपर्व के 179अध्याय में सर्प और युधिष्ठिर का संवाद है।
सर्प युधिष्ठिर से पूछते है ब्राह्मण कौन है?

युधिष्ठिर कहते है सत्य, क्षमा, मृदुता  दानशीलता और तप ये गुण यदि किसी शुद्र में हो वह शुद्र    शुद्र नहीं है।  यदि ये गुण किसी ब्राह्मण में न हो तो वह ब्राह्मण      ब्राह्मण नहीं है।
 ब्राह्मण शब्द का प्रयोग यहाँ दो बार हुआ है और दो भिन्न अर्थों में हुआ है। 
यदि ऐसा न मानें तो यह कहना कि जिस ब्राह्मण  में ये गुण नहीं है वह  ब्राह्मण  ब्राह्मण नहीं है।  वदतो व्याघात होगा।
उक्त वचन में प्रथम बार जो ब्राह्मण शब्द का प्रयोग हुआ है वह जन्मना ब्राह्मण के अर्थ में हुआ है।
दुसरी बार ब्राह्मण शब्द का अर्थ यह है कि जो गुण ब्राह्मण में होने चाहिये वे उसमें नहीं है। इस वाक्य में ब्राह्मण के लिये आवश्यक सत्य क्षमा दानशीलता मृदुता तप इन गुणों की प्रशंसा कर ब्राह्मण को मिथ्या जात्याभिमान से बचाने के लिए आया है। 
यदि ऐसा न  होता तो चर्चा केवल  ब्राह्मण  और शुद्र की ही क्यो?   क्षत्रिय और वैश्य की क्यो नहीं ?
यदि गुण आधारित वर्ण होता तो गुण प्रतिशत भी होता।  यह भी होना चाहिये था कि 100% गुण वाला ब्राह्मण 75% गुण वाला क्षत्रिय 50% गुण वाला वैश्य और 25%गुण वाला शुद्र  और  00% वाला ?

लेकिन ऐसा नहीं है। 
इस वचन का यह मतलब नहीं है कि गुण देखकर वर्ण निर्धारित करना चाहिये। 
इसके विरुद्ध कई कारण है।
1. वदतो व्याघात  

2. वेद उपनिषद, मनुस्मृति, अत्रि संहिता, हारीत संहिता, आदि शास्त्र ग्रन्थों में जन्मना जाति की ही व्यवस्था है .उसके साथ इसका विरोध होगा।
किसी वचन का ठीक अर्थ लगाते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि अन्य वचनों के साथ उसका कोई विरोध न हो। उपयुक्त में श्रुत्यादि  वचनों का इसके सिवा और कोई अर्थ नहीं है कि वर्ण या जाति जन्म पर भी निर्भर है।
वनपर्व के उपयुक्त वचन का सुसंगत अर्थ यही होता है कि सत्य दान आदि गुण वरेण्य हैं।

3. किसी व्यक्ति के असली गुणों की पहचान अत्यंत कठिन है।

4. बहुत से लोगों ने सत्य, दान आदि गुण अत्यधिक परिमाण में होते ही हैं। यह तो इस वचन में नहीं बताया गया है कि कितने दर्जे तक कौन सा गुण होने से कौन मनुष्य ब्राह्मण वर्ग का हो सकता है।

5. इस वचन में दो ही वर्णो के नाम आए हैं ब्राह्मण और शुद्र । क्षत्रिय और वैश्य का कोई नाम नहीं है। जिसमें यह गुण हैं  ब्राह्मण है और जिसमें यह  गुण नहीं है वह शुद्र हैं। फिर तो अखिल मानव जाति का ब्राह्मण और शुद्र  यही दो वर्णविभाग हुआ, चतुर्वर्ण्य नहीं रहा। इन सब बातों से यही स्पष्ट होता है कि उपरोक्त वचन का हेतु वर्ण विभाग का सिद्धांत बतलाना नहीं बल्कि सत्य, सदाचार आदि गुणों की श्रेष्ठता बतलाना है। वर्ण विभाग का सिद्धांत अन्य शास्त्र वचनों में निर्दिष्ट हो चुका है। शास्त्रवचन जन्मना जाति का ही निर्देश करते हैं। 
अतः जो वचन ऐसे हैं जिनमें गुणों और कर्मों के अनुसार जाति होने की बात सूचित होती है उनका वास्तविक अभिप्राय कुछ और ही है। गुण या कर्म के अनुसार सब मनुष्य की जाति का निर्धारण करना व्यवहारतः संभव ही नहीं है।

 कुछ लोग ऐसा कहते हैं जन्म नाम की आकस्मिक घटना के आधार पर किसी की जाति या वर्ण निश्चित करना ठीक नहीं है। यह कहना भी युक्तियुक्त नहीं है। कारण जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि हमारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल पर आधारित है। यही कारण है कि  कुछ लोग स्वस्थ और सम्पन्न  पैदा होते हैं जबकि कुछ विकलांग और दरिद्र। यह हमारे कर्मों के फल पर आधारित है।
कुछ लोग कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था हिंदू समाज में पैदा हुई समस्त बुराइयों की जड़ है।
गीता में श्रीभगवान कहते हैं चतुर्वर्ण्य  मैंने ही उत्पन्न किया है। जो व्यवस्था भगवान की बनाई हुई है वह  समाज के लिए कभी हानिकारक नहीं हो सकती।  हमारे पिछडेपन और बिखराव का मुख्य कारण  हमारी ईर्ष्या-द्वेष, लड़ाई-झगड़े, भोग-विलास आदि हैं। विश्व की प्राचीनतम  हिंदू संस्कृति की रक्षा अब तक इस कारण से हुई है क्योंकि वर्ण व्यवस्था के द्वारा धर्म, शोर्य, धन और श्रमशक्ति की रक्षा हुई है। 
यदि हम वर्णव्यवस्था को समाप्त कर देंगे महान अनर्थ होगा समाज में  वर्णसंकरता उत्पन्न होगी गीता में श्रीभगवान कहते हैं वर्णसंकरतासे प्रजाओं का सब  प्रकार से नाश होता है।
सुरभि के लिये आचार्य रोहित वशिष्ठ 9690066000