गुरुवार, 25 नवंबर 2021

अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा  काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराने के उपरांत अहिल्याबाई होल्कर से मिलने में काशी से एक विद्वान ब्राह्मण आयें। अहिल्याबाई ने उन्हे ससम्मान राजदरबार में बुलवाया। 
विद्वान ब्राह्मण के हाथ में रेशमी वस्त्र में एक पुस्तक थी। उन ब्राह्मण ने वह पुस्तक महारानी की ओर बढ़ाते हुये कहा― हे महारानी आपके द्वारा सनातन धर्म के प्रति किये गये कार्यों से प्रभावित होकर मैनें आपके सम्मान में संस्कृत पद्यों से युक्त एक ग्रन्थ की रचना की है, जिसे मैं आपको समर्पित करनें आया हुँ। अहिल्याबाई उदास मन  होकर  कहने लगी– इन ब्राह्मण को पारितोष के रूप में स्वर्ण मुद्राएं दी जाये। 
 कोषाध्यक्ष मुद्राओं से भरी थैली लेकर उपस्थित हुआ। महारानी अपने हाथ से स्वर्ण मुद्राएं ब्राह्मण को देने लगी तो ब्राह्मण ने कहा- आप अप्रसन्न मन से मुझे स्वर्ण मुद्राएं दे रही है इसका कारण ?
अहिल्या बाई होल्कर ने कहा- हे ब्राह्मण आप संस्कृत के विद्वान है, ज्ञानी है और काशी में निवास करते है यह प्रसन्नता की बात है  लेकिन आपने अपनी विद्वता और ज्ञान का  उपयोग  इस तुच्छ महिला के महिमामंडन में किया यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। आप अपने इस ज्ञान से अपनी विद्ववत्ता पूर्ण वाणी से भगवान विश्वनाथ की स्तुति करते तो निश्चय ही मुझें प्रसन्नता होती। 
ब्राह्मण को बिदा कर अहिल्याबाई होल्कर ने सेवको को बुलाकर कहा कि बडे भारी पत्थर के साथ इस पुस्तक को बांधकर नर्मदा के गहरे जल में इसे डुबा दो।
सेवकों ने ऐसा ही किया।
ऐसी भगवद्भक्ता भगवत परायण सनातन धर्म की सेवा करने वाली अहिल्याबाई होल्कर को कोटि कोटि नमन।

रविवार, 7 नवंबर 2021

नास्तिक_और_आस्तिक

#नास्तिक_और_आस्तिक
आचार्य रोहित वशिष्ठ
7नवम्बर2021

भारत के मूर्धन्य वैज्ञानिक, नोबेल पुरस्कार विजेता, भारत रत्न  #चंद्रशेखर_वेंकटरामन् अत्यंत व्यस्त होते हुए भी ईश्वर की आराधना और अपने कुल के अनुरूप धर्माचरण में प्रतिदिन कुछ समय अवश्य देते थे ।
एक बार जब वे संध्यावंदन करके उठे तो एक अन्य  भारतीय वैज्ञानिक, जो उनसे मिलने आया था और ईश्वर में विश्वास नहीं रखता था,  कहने लगा – श्रीमान! आप वैज्ञानिक होकर भी ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं , जो विज्ञान से प्रमाणित नहीं हैं। आप प्रतिदिन धर्म-कर्म के लिए आधा घंटा नष्ट कर देते हैं, किस प्रयोजन से?
 वैंकटरामन् ने उत्तर दिया अपना परलोक सुधारने के लिए । मृत्यु के बाद सद्गति हो इसलिए ।
नास्तिक वैज्ञानिक ने बड़ी उपेक्षा से उत्तर दिया कहाँ है परलोक ?  मृत्यु के बाद क्या होगा किसने देखा है ? आपको मालूम है क्या ? ईश्वर कहीं है क्या ? आपने देखा है क्या ?
 
वेंकटरामन् ने  शालीनता से कहा बंधु मैं भी वैज्ञानिक हूं और यह मानता हूं कि न तो ईश्वर को किसी ने देखा है , न हीं इस बात पर मुझे विश्वास है कि परलोक है और मृत्यु के बाद ऐसे धर्म-कर्म से कोई स्वर्ग जा सकता है । 
 मैं मानता हूँ कि सत्यापित किए बिना किसी बात को अंधानुकरण के रूप में नहीं मानना चाहिए ।

अब मैं आपसे पूछता हूँ  कि क्या आपने आपके  विज्ञान ने यह सत्यापित कर दिया है कि  ईश्वर नहीं है ? क्या यह निश्चित कर लिया है कि मृत्यु के बाद यह होगा , और यह नहीं होगा ।

नास्तिक वैज्ञानिक ने उत्तर दिया― यह सभी बातें अनिश्चित हैं । प्रमाणित नहीं । आप भी उन्हें मानने लगे ?  कौन कह सकता है कि ईश्वर है या नहीं ? मृत्यु के बाद क्या होगा ? 

 श्री वेंकटरामन्  जी ने कहा कि ' यह सच है यह बात बिल्कुल अनिश्चित हैकि  ईश्वर का , परलोक का , पुनर्जन्म का , मृत्यु के बाद की गति का कोई अस्तित्व  भी है या नहीं ― यह सब संभावना मात्र हैं ।  हो सकता है कि यह नहीं हों , यह भी हो सकता है कि यह हों । 

यदि यह सब मिथ्या है और नहीं है तो प्रतिदिन मेरा आधा घंटा धर्माचरण में व्यर्थ नष्ट हुआ माना जाएगा ।
कोई बात नहीं कभी-कभी व्यर्थ के काम में भी कुछ समय नष्ट हो जाए तो अनर्थ नहीं हो जाता ।

पर कल्पना करो कि यदि यह सब सत्य हो , वास्तव में हो । तो क्या होगा ? 
 यदि इस संभावना के नाम पर हम अपने आप को किसी दैनिक नियम से बांध लें तो क्या बुरा है ?
 यदि इसके बिना परलोक में दुर्गति की स्थिति हुई तो आपका क्या होगा ?
 उस नास्तिक वैज्ञानिक के पास इसका कोई उत्तर नहीं था । हो भी नहीं सकता ।
वासुदेवकल्याणम्

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

रावण व कुम्भकर्ण संवाद

कुम्भकर्ण ने रावण से कहा-भाई स्त्री स्वभावतः भीरू होती हैं। सीता को भय दिखाकर अपनी पत्नी बना लेते ।
रावण बोला- भाई मैने ऐसा किया था। जब मैने उस सीता को अपनी चन्द्रह्रास खड्ग से भयभीत करना चाहा तो उसने एक तृण दिखाकर मुझे ही भयभीत कर दिया।
कुम्भकर्ण ने कहा-उसे धनादि का लोभ देते।
रावण ने कहा-मैने उसे प्रधान रानी होने का लोभ दिया लेकिन उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। 
कुम्भकर्ण पुनः बोला- भाई तुम तो मायावी हो। अरे राम रूप धरकर उसके पास जाते तो निश्चय ही वो तुम्हें प्राप्त हो जाती।
रावण ने कहा - ऐसा मैनें किया था लेकिन जैसे ही मैनें रामरूप धारण किया मन्दोदरी और अन्य रानियों के अतिरिक्त जिस भी स्त्री को निहारता उसमें मुझे अपनी  माँ केकशी नजर आती।
कुम्भकर्ण ने कहा - राम विग्रहवान धर्म है
रावण तुम्हारी और राम की कौई बराबरी नहीं ।
विभीषण की भाति ही तुम्हें भी धर्म की शरण ग्रहण करनी चाहिये।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?

वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?
आचार्य रोहित वशिष्ठ
10अक्टूबर 2021
वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था जन्म से या कर्म से ?
अपने मत से पूर्व हमें  शास्त्रमत का अवलोकन अरना आवश्यक है।
इस विषय में धर्मशास्त्र का क्या मत है आईये जानते है।इस लेख के माध्यम से
कुछ आधुनिक हिंदुओं का कहना है कि " वर्ण व्यवस्था तो हम मानते हैं; क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने भी कहा है कि चतुर्वर्ण की सृष्टि मैंने की है। पर चतुर्वर्ण से भगवान का अभिप्राय जन्मना जाति मानने वाली व वर्तमान व्यवस्था नहीं है,  किंतु वह व्यवस्था है जिसमें मनुष्य के गुण व कर्म के अनुसार उसका वर्ण निश्चित होता है।
भगवान ने स्पष्ट ही गुणकर्मविभागशः कहा है " ।
अतः इन लोगों का मत है कि जन्मना जाति मानने वाली वर्तमान पद्धति को हटा देना चाहिए और वही प्राचीन व्यवस्था जिसका निर्देश भगवान ने किया है  अर्थात मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसके अनुसार उसका वर्ण निश्चित करने वाली व्यवस्था फिर से स्थापित करनी चाहिए। तभी हमारे समाज के अंदर सच्चे और अच्छे लोग ब्राह्मण कहलाएंगे और ऐसी वर्ण व्यवस्था से समाज का कल्याण  होगा । वर्तमान व्यवस्था में केवल ब्राह्मण कुल में जन्म हो जाने से ही ऐसे-ऐसे लोग ब्राह्मण कहलाते हैं जिनमें जरा भी योग्यता नहीं है। इससे बहुत बड़ी हानि हुई है।  हम लोगों का राजनीतिक दासत्व इसी का परिणाम है।  इसी से सब बुराइयां उत्पन्न हुई है। जिससे हिंदू समाज त्रस्त है।

इस लेख को पढने से  निश्चय ही यह समझ में आ जाएगा कि भगवान श्रीकृष्ण या श्रीमद्भगवतगीता का यह अभिप्राय नहीं है कि किसी मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसका वर्ण निश्चित किया जाए;   बल्कि उन्हें यही बतलाना है कि किसी की  जाति उसके जन्म से ही जाननी चाहिए। जन्मना जाति की व्यवस्था पर जो अन्य आक्षेप किये जाते हैं,  वे किस प्रकार निराधार हैं।

1. यदि किसी मनुष्य की जाति उसकी वृत्ति या  कर्म पर निर्भर होती तो द्रोणाचार्य क्षत्रिय कहलाते ब्राह्मण नहीं क्योंकि उनका व्यवसाय युद्ध करना था। 
पर जन्म के कारण ही वह ब्राह्मण थे।

2. उनके श्यालक (पत्नी के भाई)  कृपाचार्य योद्धा होने पर भी ब्राह्मण थे क्योंकि ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ था।

3.  अश्वत्थामा में ब्राह्मण के न तो कोई गुण थे उनके कर्म ही ब्राह्मण के अनुकूल थे। वे तो  इतने क्रूर थे कि रात में पांडवों के शिविर में घुसकर सोते हुए द्रोपती के बच्चों का उन्होंने कत्ल कर डाला।  उत्तरा के गर्भस्थ बालक पर भी उन्होंने अति भयंकर बाण चलाया । फिर जब फिर भी जब भी पकड़े जाते हैं तब यही निश्चित किया गया है अश्वत्थामा का वध नहीं हो सकता; कारण भी बताया कि अश्वत्थामा जन्मना  ब्राह्मण है।  इसलिये अपराधी होते हुये भी उन्हे प्राण दण्ड न देकर सिर-मूँछ मुडाकर देश निकाला दे दिया गया ।
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद् गौरवेन च।।
महाभारत सौप्तिक पर्व 16|32

गुण कर्म के अनुसार किसी मनुष्य का वर्ण निश्चित करने में एक बहुत बड़ी बाधा है।
 प्रायः ऐसा देखने में आता है कि किसी मनुष्य के गुण तो उसे एक वर्ण का बतलाते हैं पर उसका कर्म दूसरे ही वर्ण का होता है ऐसी अवस्था में उसका वर्ण कैसे निश्चित किया जाएगा। फिर किसी मनुष्य के गुणों की पहचान करना भी बहुत कठिन है। बाह्य स्वरूप से गुणों का ठीक ठीक पता नहीं चलता अक्सर धोखा हो जाता है। ऐसा हो सकता है कि बाहर से देखने में कोई मनुष्य बहुत उग्र और रुखा हो पर उसका हृदय अत्यंत कोमल और उदार हो । ऐसा भी हो सकता है कि कौई व्यक्ति  वाणी बहुत मधुर हो पर हृदय से अत्यंत कठोर ।  एक ही मनुष्य में गुण-दोष के अवलोकन करने  में मतभेद भी हो सकता है उस व्यक्ति के मित्र कहेंगे कि अमुक व्यक्ति अत्यंत सज्जन है शत्रु कहेंगे वह महादुर्जन है। चलो यह भी मान लिया जाए कि गुणों का पता लोग परख ही लेगें तो भी इस बात क्या भरोसा कि उसके वे गुण उस व्यक्ति में आजीवन बने रहें। अक्सर देखने में आता है सज्जन व्यक्ति में दुर्जनता का भाव  उत्पन्न हो जाता है और  दुर्जन व्यक्ति को  सज्जन बनते देर न लगती। ऐसी स्थिति में  गुण और कर्म से जाति का निर्धारण कैसे हो सकता है।

कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में अर्जुन ने कहा मैं युद्ध नहीं करूंगा भिक्षा मांगकर जी लूंगा।  यदि गुण और कर्म से ही जाति निश्चित हो जाती तो फिर भगवान श्री कृष्ण को गीता का उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ती।  अर्जुन में ब्राह्मणों के वे सभी गुण थे जिसका गीता जी में उल्लेख किया गया है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।
शम, दम, तप, शुचिता, क्षमा, आर्जव, ज्ञान-विज्ञान आस्तिकता   ये  सब ब्राह्मणों के स्वाभाविक गुण है। भिक्षावृत्ति ब्राह्मण की है।
गुणकर्म के अनुसार अर्जुन को ब्राह्मण ही होना चाहिये फिर युद्ध न करने से उसे कौन सा पाप लगता ।
लेकिन भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि यदि तुम युद्ध नहीं करोगे तो तुम्हें पाप लगेगा।
 श्रीकृष्ण का ऐसा कहना तो तभी युक्तिसंगत हो सकता है जब जन्मना जाति मानने की ही व्यवस्था हो क्योंकि अर्जुन जन्म से क्षत्रिय है।  क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना यदि अर्जुन युद्ध नहीं करता तो वह अपने धर्म की अवहेलना करता है और पाप का भागी होता है।
जब जन्मजात वर्ण से कर्म और धर्म निश्चित होता है तभी कोई मनुष्य जो चाहे वह कर्म नहीं कर सकता ।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र ही प्रमाण हैं। 
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

शास्त्रों में सबसे पहले वेद है। ये ही सब शास्त्रों के आधार हैं।  ऋग्वेद संहिता के 10|90 (पुरुष सूक्त) में तथा तैत्तिरीय संहिता के 7|1|1 में बताया गया है कि चार वर्ण प्रजापति ब्रह्मा के चार  अंगों से उत्पन्न हुए हैं। 
छान्दोग्योपनिषद के 5|10|7 में यह वर्णन है कि जो लोग पुण्य कर्म करते हैं,  वे  दूसरे जन्म में ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य  कुल में जन्म लेते हैं और जो पाप कर्म करते हैं में चांडाल आदि योनियों में प्राप्त होते हैं। 
रमणीय चरणा रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मण योनिं वा क्षत्रिय योनिं वा वैश्ययोनिं वा। कपूय चरणाः कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डाल योनिं वा।

मनुस्मृति का वचन है
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु ।
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त एव हि।।
मनु.10|5 
सब वर्णो की अक्षत-योनि तुल्य पत्नियों में गर्भाधान करने से जो संतान हो, उन्हे अनुलोम क्रम से उन्ही वर्णों की जानना चाहिये।ब्राह्मण पतिपत्नी से उत्पन्न संतान ब्राह्मण, क्षत्रिय पति पत्नी से उत्पन्न संतान क्षत्रिय वैश्य पति पत्नी से उत्पन्न संतान वैश्य इस प्रकार जानना चाहिये।

हारीत संहिता का वचन है-
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैवमुत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः। 1|15
ब्राह्मणी में ब्राह्मण से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण ही कहा गया है।

अत्रि संहिता का वचन है- 
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय संस्काराद् द्विज उच्यते। 1|40
जन्म से ब्राह्मण जाना जाता है संस्कार होने पर द्विज-संज्ञा होती है।

गीता में गुणकर्मविभागशः कहने का अर्थ
यहाँ कर्म कहने का अर्थ वृत्ति या जीविका नहीं कर्तव्य है.
कर्म विभाग का अर्थ है विभिन्न वर्णों के कर्तव्य ।
गुण का अर्थ त्रिगुण सत्व रज और तम से है। गुण विभाग जन्म के साथ लगे हुये गुणों के अनुसार मनुष्यों का वर्गीकरण है।

कर्मणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवैर्गुणैः।
गीता 18|41
स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार कर्मो का विभाग हुआ है।
यहाँ " स्वभाव प्रभव " का भाव यही है कि   जन्मजात गुणों  के द्वारा ही वर्ण निश्चित होता है।

अब प्रश्न यह है कि विश्वामित्र क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर ब्राह्मण वर्ण में कैसे परिवर्तित हुयें?
उत्तर है तप से ।
कर्म से नहीं तप से 
यह बात विश्वामित्र जी भी जानते थे कि कर्म से ब्राह्मण बनना सम्भव ही नहीं है अतः उन्होने तप करने का निश्चय किया। 
कितने वर्ष तप किया?
हजारों वर्ष तप किया ?
तप का अर्थ ही है शरीर को तपाना ।
केवल  तप में ही वह शक्ति है जो शरीर के परमाणु बदल सकें। 
वर्ण का सम्बन्ध जन्मजात शरीर से है।
अब  तप के द्वारा शरीर के परमाणु बदले या नहीं इस बात का परीक्षण करना केवल वशिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षियों  के द्वारा ही सम्भव है। यही कारण है कि  ब्रह्मा जी ने उन्हे कह दिया था कि वशिष्ठ जी के अनुमोदन के बिना इस शरीर में ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असंभव है।

महाभारत के वनपर्व के 179अध्याय में सर्प और युधिष्ठिर का संवाद है।
सर्प युधिष्ठिर से पूछते है ब्राह्मण कौन है?

युधिष्ठिर कहते है सत्य, क्षमा, मृदुता  दानशीलता और तप ये गुण यदि किसी शुद्र में हो वह शुद्र    शुद्र नहीं है।  यदि ये गुण किसी ब्राह्मण में न हो तो वह ब्राह्मण      ब्राह्मण नहीं है।
 ब्राह्मण शब्द का प्रयोग यहाँ दो बार हुआ है और दो भिन्न अर्थों में हुआ है। 
यदि ऐसा न मानें तो यह कहना कि जिस ब्राह्मण  में ये गुण नहीं है वह  ब्राह्मण  ब्राह्मण नहीं है।  वदतो व्याघात होगा।
उक्त वचन में प्रथम बार जो ब्राह्मण शब्द का प्रयोग हुआ है वह जन्मना ब्राह्मण के अर्थ में हुआ है।
दुसरी बार ब्राह्मण शब्द का अर्थ यह है कि जो गुण ब्राह्मण में होने चाहिये वे उसमें नहीं है। इस वाक्य में ब्राह्मण के लिये आवश्यक सत्य क्षमा दानशीलता मृदुता तप इन गुणों की प्रशंसा कर ब्राह्मण को मिथ्या जात्याभिमान से बचाने के लिए आया है। 
यदि ऐसा न  होता तो चर्चा केवल  ब्राह्मण  और शुद्र की ही क्यो?   क्षत्रिय और वैश्य की क्यो नहीं ?
यदि गुण आधारित वर्ण होता तो गुण प्रतिशत भी होता।  यह भी होना चाहिये था कि 100% गुण वाला ब्राह्मण 75% गुण वाला क्षत्रिय 50% गुण वाला वैश्य और 25%गुण वाला शुद्र  और  00% वाला ?

लेकिन ऐसा नहीं है। 
इस वचन का यह मतलब नहीं है कि गुण देखकर वर्ण निर्धारित करना चाहिये। 
इसके विरुद्ध कई कारण है।
1. वदतो व्याघात  

2. वेद उपनिषद, मनुस्मृति, अत्रि संहिता, हारीत संहिता, आदि शास्त्र ग्रन्थों में जन्मना जाति की ही व्यवस्था है .उसके साथ इसका विरोध होगा।
किसी वचन का ठीक अर्थ लगाते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि अन्य वचनों के साथ उसका कोई विरोध न हो। उपयुक्त में श्रुत्यादि  वचनों का इसके सिवा और कोई अर्थ नहीं है कि वर्ण या जाति जन्म पर भी निर्भर है।
वनपर्व के उपयुक्त वचन का सुसंगत अर्थ यही होता है कि सत्य दान आदि गुण वरेण्य हैं।

3. किसी व्यक्ति के असली गुणों की पहचान अत्यंत कठिन है।

4. बहुत से लोगों ने सत्य, दान आदि गुण अत्यधिक परिमाण में होते ही हैं। यह तो इस वचन में नहीं बताया गया है कि कितने दर्जे तक कौन सा गुण होने से कौन मनुष्य ब्राह्मण वर्ग का हो सकता है।

5. इस वचन में दो ही वर्णो के नाम आए हैं ब्राह्मण और शुद्र । क्षत्रिय और वैश्य का कोई नाम नहीं है। जिसमें यह गुण हैं  ब्राह्मण है और जिसमें यह  गुण नहीं है वह शुद्र हैं। फिर तो अखिल मानव जाति का ब्राह्मण और शुद्र  यही दो वर्णविभाग हुआ, चतुर्वर्ण्य नहीं रहा। इन सब बातों से यही स्पष्ट होता है कि उपरोक्त वचन का हेतु वर्ण विभाग का सिद्धांत बतलाना नहीं बल्कि सत्य, सदाचार आदि गुणों की श्रेष्ठता बतलाना है। वर्ण विभाग का सिद्धांत अन्य शास्त्र वचनों में निर्दिष्ट हो चुका है। शास्त्रवचन जन्मना जाति का ही निर्देश करते हैं। 
अतः जो वचन ऐसे हैं जिनमें गुणों और कर्मों के अनुसार जाति होने की बात सूचित होती है उनका वास्तविक अभिप्राय कुछ और ही है। गुण या कर्म के अनुसार सब मनुष्य की जाति का निर्धारण करना व्यवहारतः संभव ही नहीं है।

 कुछ लोग ऐसा कहते हैं जन्म नाम की आकस्मिक घटना के आधार पर किसी की जाति या वर्ण निश्चित करना ठीक नहीं है। यह कहना भी युक्तियुक्त नहीं है। कारण जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि हमारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल पर आधारित है। यही कारण है कि  कुछ लोग स्वस्थ और सम्पन्न  पैदा होते हैं जबकि कुछ विकलांग और दरिद्र। यह हमारे कर्मों के फल पर आधारित है।
कुछ लोग कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था हिंदू समाज में पैदा हुई समस्त बुराइयों की जड़ है।
गीता में श्रीभगवान कहते हैं चतुर्वर्ण्य  मैंने ही उत्पन्न किया है। जो व्यवस्था भगवान की बनाई हुई है वह  समाज के लिए कभी हानिकारक नहीं हो सकती।  हमारे पिछडेपन और बिखराव का मुख्य कारण  हमारी ईर्ष्या-द्वेष, लड़ाई-झगड़े, भोग-विलास आदि हैं। विश्व की प्राचीनतम  हिंदू संस्कृति की रक्षा अब तक इस कारण से हुई है क्योंकि वर्ण व्यवस्था के द्वारा धर्म, शोर्य, धन और श्रमशक्ति की रक्षा हुई है। 
यदि हम वर्णव्यवस्था को समाप्त कर देंगे महान अनर्थ होगा समाज में  वर्णसंकरता उत्पन्न होगी गीता में श्रीभगवान कहते हैं वर्णसंकरतासे प्रजाओं का सब  प्रकार से नाश होता है।
सुरभि के लिये आचार्य रोहित वशिष्ठ 9690066000

सोमवार, 27 सितंबर 2021

श्राद्ध महिमा

सनातन धर्म पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानता है। धर्म ग्रन्थों का सार है जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है और जो मर जाता है उसका जन्म भी अवश्य होता है।  शरीर के नष्ट होने पर आत्मा नष्ट नहीं होता आत्मा अजर, अमर, नित्य और अव्यय है― यह सिद्धांत सनातन धर्म का सिद्धांत है।
 अपने किये शुभ अशुभ कर्मो के फल को जब तक  नही जाता तब तक उसको मुक्ति नहीं मिलती। इसीलिए मुक्ति प्राप्ति के लिए निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए― ऐसा धर्म शास्त्रों ने निश्चित किया है। 
साधना-आराधना करते करते किसी जन्म में मनुष्य को ततो याति परां गतिम्। अर्थात परम गति को पाता है। यदि साधना-आराधना के आभाव में और यह मानव जीवन यूं ही भोग-विलास में यू ही बिता  दिया जाए तो फिर पुनरपि जननं पुनरपि मरणं की श्रंखला में वह  बंधा ही रहता है।
जन्म और मरण स्थूल शरीर का होता है । सूक्ष्म और कारण शरीर में जन्म जन्मांतर के संस्कार संचित रहे हैं। यह  सूक्ष्म और कारण शरीर बड़ा ही विलक्षण है।  परलोक की यातना, नरक की यंत्रणा से न तो यह नष्ट होता है और न ही स्वर्ग के सुख-उपभोग  से विकार को प्राप्त होता है।  यह इतना विलक्षण होता है विशालकाय हाथी जैसे शरीर में तो रहता ही है साथ ही कीटाणु और चीटी जैसे  छोटे शरीर में भी  रह सकता है।
 जब कभी उसे मनुष्य का शरीर मिलता है तभी उसकी मुक्ति की सम्भावना बनती है। इसलिये मनुष्य शरीर को  साधन धाम मोक्ष कर द्वारा  कहकर इसकी महत्ता को प्रतिपादित किया गया है। इस मनुष्य शरीर में ही व्यक्ति साधन के द्वारा अपना कल्याण कर सकता है मनुष्य शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी शरीर के द्वारा जन्म मरण के चक्कर से छूटना अत्यंत कठिन है। ।
धर्म शास्त्रों में परलोक का वर्णन अनेक स्थानों पर किया गया है।
उनमें से एक  कठोपनिषद का वचन है― न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तंवित्तमोहेन मूढ़म। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यतेमे।। 1|2|6
 यम  नचिकेता से कहते हैं कि धन के मोह से मोहित, प्रमादी,  अज्ञानी को परलोक  प्रतिभासित नहीं होता। वह समझता है कि यही लोक है परलोक नहीं है― ऐसा मानने वाला पुरुष बारम्बार मेरे वश को प्राप्त होता है।
इसी परलोक और पूनर्जन्म के सिद्धांत के आधार पर धर्म शास्त्रों में मृतक श्राद्धकर्म  को अनिवार्य  कहा गया है। इस कर्म को  हम आश्विन कृष्ण पक्ष में करते हैं। वह पक्ष  पितृपक्ष कहलाता है।
इस पूरे पक्ष में  नित्य और नैमित्तिक पितरों का श्राद्ध और तर्पण पिंडदान आदि कर्म किया जाता है। उसी श्राद्ध-तर्पण-पिण्डदान का अंग ब्राह्मण-भोजन है।
 इस लोक में अथवा परलोक में और जहाँ कही भी पितरों का निवास होता है― वहीं वेद मंत्रों के द्वारा श्राद्ध-कर्म से पितरों की तृप्ति होती है। इस कर्म को करते समय संशय  नहीं रखना चाहिए। क्योंकि धर्म ग्रन्थों में  अनैक स्थानों पर श्राद्ध कर्म की महिमा वर्णित है।
पितृलोक में किस प्रकार पितरों की प्राप्ति होती है? इस विषय में धर्म शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है हमारे द्वारा प्रदत्त वस्तु किस प्रकार हमारे पितरो तक पहुँचती है उसे हम इस उदाहरण के द्वारा  समझ  सकते है। 
 यदि  अमेरिका आदि देशों में रह रहे किसी  परिचित को  भारत से धनराशि धनराशि भेजनी है तो हम उस धनराशि को बैंक में जमा करके बैक के माध्यम से उस धनराशि को अमुक व्यक्ति तक  भिजवाँ सकते हैं। लेकिन यह बात तो  हम सभी को ज्ञात है कि हमने भले ही भारतीय मुद्रा  में  धन जमा किया हो उस व्यक्ति को वह धन उस देश की मुद्रा के रूप में प्राप्त होगा।  इसी छोटे से उदाहरण से  हम श्रद्धा के विषय को भी समझ सकते है।  ब्राह्मण के माध्यम से एवं वेदमंत्रों के प्रभाव से हमारे द्वारा दिया गया श्राद्धान्न  हमारे पितरों  को इसी प्रकार अन्य लोकों  में प्राप्त हो जाता है। 
पद्म पुराण के सृष्टि खंड के 33वें अध्याय में कथा आती है कि वनवास के समय पुष्कर क्षेत्र में एक बार महाराजा दशरथ के श्राद्ध का समय उपस्थित हुआ। उस दिन बनवासी ब्राह्मणों को भोजन के लिए निमंत्रित किया गया। श्राद्ध के समय जब ब्राह्मण भोजन के लिए आये  तो भोजन करते समय उन्हें देख श्री सीता माता जी छिप  गई। तब भगवान राम ने पूछा कि ― हे सीते! इस समय तुम छिप क्यों गई हो?  तब सीताजी ने कहा कि ― हे राघव ! मैंने भोजन करते हुए ब्राह्मणों के शरीर में आपके पिताजी को देखा है। इसलिये लज्जा   के कारण मै यहाँ से हटकर  छिप गई हुँ।
पिता तव मया दृष्टो ब्राह्मणांगेषु राघव।
दृष्ट्वा त्नपान्विता चाहमपक्रान्ता तवान्तिकात्।।
जिस समय मेरा विवाह हुआ था तब पिताजी ने मुझे सर्वालंकार विभूषित देखा था तब हर्ष से फूले नहीं समाते थे ।अयोध्या से जब मैं वन को चली तो मेरे तपस्विनी वेश को देख कर इतने दुखी हुए थे कि उन्होंने अपना शरीर ही त्याग दिया था। यहाँ  मुझे संदेह हुआ  कि इस समय ऐसी अवस्था में मुझे देखकर कहीं ऐसा न हो कि वह दुखी होकर अपने पितृ शरीर को ही  न छोड़ दे।  दूसरा यह भी है कि इस समय जो भोजन श्राद्ध में था वह ऐसा था जिसे कभी महाराज के सेवकों ने भी नहीं खाया होगा  उसे मैं अपने ससुर को कैसे परोसती?  उन्हें देखकर मैं लज्जा और दुःख  के कारण आपके पास से हट गई।  भला मैं अपने स्वर्गीय महाराज के सामने कैसे खड़ी होती?  यही इसका कारण था। 

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड 102वें अध्याय  में भी श्राद्ध का वर्णन आया है वहाँ  पर लिखा है कि ― श्री रामचंद्र जी ने भाइयों सहित मंदाकिनी के तट से ऊपर आकर पिता को पिंडदान किया। श्री राम जी ने बेर मिले हुए इंगुदी  के फलों का पिंड बनाकर कुशाओं  के ऊपर रखकर अत्यंत दुखी होकर रोते हुए कहा कि ― हे महाराज आजकल हम लोग जो  खाते हैं वहीं इस समय आप भी भोजन कीजिए। क्योंकि मनुष्य जो स्वयं खाता है उसी से वह अपने देवताओं को भी संतुष्ट करता है।  इस प्रकार भगवान राम के द्वारा पिता के श्राद्ध-कर्म का वर्णन है।
 वेद में भी श्राद्धकर्म के विषय म़े लिखा है―
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः।
सर्वांस्तानग्र आवह पितृन् हविषं अत्तये।।
अथर्ववेद 18|2|34
अर्थात जिन पितरों के शरीर पृथ्वी में गाड़े गए हैं या छोड़ दिए गए हैं या अग्नि में जला दिए गए हैं और वे ऊर्ध्व स्वर्गादि  लोगों को चले गए हैं, हे अग्ने! हमारे उन सब पितरों को श्राद्ध के समय भोजन के लिये आवाहन करों। ©आचार्य रोहित वशिष्ठ 9690066000

शनिवार, 18 सितंबर 2021

अमृत बिन्दु

मंत्र जाप  मम दृढ़  विश्वासा।
पंचम भजन जो वेदप्रकाशा।।
" भगवान  मेरा कल्याण करेगें " ―  इस दृढ़ विश्वास के साथ मंत्र जप करने से मनुष्य शीघ्र ही कल्याण का भागी होता है।

बुधवार, 15 सितंबर 2021

तत्व विवेचन

लेखक - वीतराग शिरोमणिपरमपूज्य गुरूदेव समर्थ श्री जी 

समग्र प्रपंच को समझने के लिए कुछ विचारक 24 तत्व,कुछ 36 तत्व ,कुछ 96 तत्व मानते हैं।
महामुनि ऋभु की जिज्ञासा पर
वराह भगवान...कहते हैं।
चतुर्विंशति तत्त्वानि केचिदिच्छन्ति वादिनः।
केचित् षट्त्रिंशत् तत्त्वानि केचित् षण्णवतीनि च।।वराहोपनिषत्1/1
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5-ज्ञानेन्द्रियाँ(श्रोत्र त्वचा नेत्र जिह्वा घ्राण)
5-कर्मेंद्रियां(वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ)
5-प्राण अपान व्यान उदान समान
5-शब्दादि विषय(शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध)
4-अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार)
1-प्रकृति
इस प्रकार प्रकृति सहित 24 तत्त्व ही 25 तत्त्व हुए।
चतुर्विंशति तत्त्वानि तानि ब्रह्मविदो विदुः।।1/4वराहोपनिषत्
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इन्हीं {ज्ञानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां प्राण शब्दादि विषय अन्तःकरण और प्रकृति रूप} 25 तत्त्वों में अग्रिम 11 तत्त्व मिलाने से 36 तत्त्व होते हैं।
5-पंचीकृत महाभूत (भू जल अग्नि वायु नभ)
3-देहत्रय (स्थूल सूक्ष्म कारण)
3-अवस्थात्रय (जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति)
11+25=36
आहत्य तत्त्वजातानां षट्त्रिंशन् मुनयो विदुः।।1/7
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इन्हीं {ज्ञानेद्रियां कर्मेन्द्रियां प्राण शब्दादि विषय अन्तःकरण प्रकृति पंचीकृत महाभूत शरीरत्रय अवस्थात्रय रूप}36 तत्त्वों में अग्रिम 60 तत्त्वों को मिलाने से 96 तत्त्व पूर्ण होते हैं।
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6-विकार (अस्ति जायते वर्धते परिणाम क्षय नाश)
6-ऊर्मि (अशना पिपासा शोक मोह जरा मृत्यु)
6-कोश (त्वक् रक्त मांस मेद मज्जा अस्थि)
6-शत्रु (काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य)
3-जीव (विश्व तैजस प्राज्ञ)
3-गुण (सत रज तम)
3-कर्म (प्रारब्ध क्रियमाण संचित्)
5-कर्मेन्द्रियकर्म (वचन आदान गमन विसर्ग आनंद)
4-अन्तःकरणकर्म (संकल्प अध्यवसाय (निश्चय) अभिमान अवधारणा)
4-चित्तधर्म (मुदिता करुणा मैत्री उपेक्षा)
5-ज्ञानेन्द्रिय देवता (दिशा वायु सूर्य वरुण अश्विनीकुमार)
5-कर्मेन्द्रियदेवता (अग्नि इन्द्र उपेन्द्र यम प्रजापति)
4-अन्तःकरणदेवता (चंद्र ब्रह्मा रुद्र क्षेत्रज्ञेश्वर)
इस प्रकार ये 60 तत्त्व और पूर्वोक्त 36 तत्त्व कुल मिलाकर 96 तत्त्व हो गये।
आहत्य तत्त्वजातानां षण्णवत्यस्तु कीर्तिताः।।1/15

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

आशीर्वाद―आवश्यकता और सही विधि

प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं
विधीयते साधु मिथः सुमध्यमे।
प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा
गुहाशयायैव न देहामानिने।।
श्रीमद्भागवत 4|3|22
श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध के तृतीय अध्याय में भगवान शिव माता सती से कहते हैं– यह सम्मुख जाना, नम्रता दिखाना, प्रणाम करना आदि क्रियाएं जो लोक-व्यवहार में परस्पर की जाती हैं; वे तत्व ज्ञानियों के द्वारा बहुत अच्छे ढंग से की जाती है। वें अंतर्यामी रूप से सबके अंतःकरण में स्थित परमात्मन्-पुरुष  को ही प्रणाम करते हैं; शरीर और शरीर में अभिमान रखने वाले अहंकार को नहीं करते।
सनातन धर्मी समाज में बडप्पन का कारण धन,ऐश्वर्य, पद नहीं है।
अपने वर्ण में समान शिक्षित धनी पुरुष भी अपने वर्ण के  वृद्ध पुरुष को पहले प्रणाम करता है, चाहे वह निर्धन ही क्यों न हो।  यही सनातनी हिंदू समाज का शिष्टाचार है।
 यदि सनातनी शिष्टाचार के विरुद्ध गर्ववश कोई व्यक्ति  अपने से बड़े व्यक्ति  को प्रणाम न करें तो बड़े को पहले प्रणाम नहीं करना चाहिए  और ना ही उसके प्रणाम किये बिना ही उसे आशीर्वाद ही देना चाहिए।
जब बड़ा पुरुष छोटे को प्रणाम करता है या बिना प्रणाम किये ही  आशीर्वाद देता है उसके ऐसा करने से  छोटे का तेज, आयु, कीर्ति और लक्ष्मी का ह्रास होता है।
 अतः उसे बुरा भी लगे तो भी उसके हित के लिए बड़ों को ऐसा नहीं करना चाहिए ।
जिसे प्रणाम किया जाता है उसे यह समझना चाहिए कि यह परिणाम उसके शरीर को नहीं किया गया है।  यह प्रणाम उसके हृदय में स्थित परमात्मा को किया गया है। प्रणाम करने वाले को अपनी शुद्धि-अशुद्धि का विचार करना चाहिए परंतु जिसे प्रणाम किया गया है उसे प्रणाम करने वाले की शुद्धि अशुद्धि का विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रणाम वह अपने शरीर के लिए नहीं ले रहा है।  यदि शरीर की दृष्टि से यह विचार करता है तो उसका अर्थ यह है कि प्रणाम उसने शरीर की दृष्टि से स्वीकार किया गया है। इससे उसके तेज की हानि होती है।  प्रणाम करने पर उसे मर्यादा का पालन करते हुए आशीर्वाद देना ही चाहिए।
 यह आशीर्वाद वह  देह में स्थित सर्वसाक्षी की ओर से दिया जाता है ।
 किसी के प्रणाम करने पर भी आशीर्वाद ने देना, मौन रहना, संकेत से स्वीकृति देना  करना अशिष्ट कहलाता है। दोनों हाथों की अंजली सम्मुख करके आशीर्वाद देना शास्त्र निर्दिष्ट है।

 दोनों हथेलियों प्रणत के मस्तक पर स्थापित करके उसे आशीर्वाद देना यह आशीर्वाद की पूर्णता है। केवल मुख से आशीर्वचन का उच्चारण करना आशीर्वाद देने का संक्षिप्त रूप है।  
समान व्यक्ति प्रणाम करने के बदले प्रणाम ही करते हैं।
 यदि चरणों में प्रणाम करने वाला व्यक्ति श्रद्धावश कुछ क्षण चरणों में ही माथा रखे रहे तो उसे उसे उठने की प्रेरणा देना या अपने दोनों हाथों से उसे उठाना यह भी शिष्टाचार है।  यदि कोई भगवान के नाम-स्मरण से अभिवादन करता है तो हमें भी उसी नाम-स्मरण से उत्तर देना चाहिए।  जैसे यदि हमें राम-राम कहे तो हमें भी उसे राम-राम कह कर ही उत्तर देना चाहिये।  कोई जय श्री कृष्ण कहे तो हमें भी उसे जय श्री कृष्ण कह कर ही उत्तर देना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे संप्रदाय के लोगों से व्यवहार करते समय प्रणाम आदि का ऐसा ही रूप होना चाहिए। उसे चिढ़ाने के लिये नहीं भगवन्नामोच्चार नहीं करना चाहिये।

शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा― विधिमुख से तथा निषेधमुख से (कल्याणकारी लेख)

लेखक―वीतरागशिरोमणि, नैष्ठिकब्रह्मचारी, अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ के अध्यक्ष परम पूज्य प्रातःस्मरणीय गुरूदेव  समर्थश्री स्वामी श्री त्रयंबकेश्वर चैतन्य जी महाराज 
 शिक्षा प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, सीखने वाला चाहिये। 
निरन्तर होता परिवर्तन हमें संसार की नश्वरता का बोध कराता है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई, तुलसीदास, रैदास, कबीर, सूरदास, नरसी आदि का चरित्र देखकर, सुनकर हमें चाहिए की बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों का अनुसरण करें। कसंग को छोड़कर सत्संग करें।  अन्याय-अनीति को छोड़कर न्याय-रीति से चलें।  अन्याय-अनीति का प्रतिकार करें, चुप न बैठें।  कहते हैं अन्याय करना पाप है तो अन्याय सहना महापाप है, परंतु अन्याय होते देखकर चुप रह जाना, उसका विरोध ना करना घोरातिघोर महापाप है।

 आपको अपने मन की बात बताते हैं― जब हम छोटे थे, घर वालों के साथ रामलीला देखने गये।  रामलीला में श्री विश्वामित्र जी महाराज के साथ श्री राम-लक्ष्मण को देखा बस मन अटक गया। उनके वस्त्रों को,  बोलने के ढंग को देखते ही मन में भाव जगा कि हमको भी ऐसा ही बनना है।  यह तो पता नहीं कि उनके जैसे बने या कि नहीं बने परंतु वेशभूषा एवं जीने का ढंग उनके जैसा हो ही गया। सत्य तो यह है कि इंसान जैसा होना चाहता है एक-ना-एक  दिन वैसा हो ही जाता है।  यह व्यक्ति की तत्परता और लगन पर निर्भर करता है कि ये सफर कितना शीघ्र पूर्ण  होगा और कितनी देर लगेगी। 
      संभवतः हम सप्तमी कक्षा में पढ़ते थे वहाँ हमारे एक अध्यापक थे जिनकी शालीनता, योग्यता तथा व्यवहारोन्मुख  सहयोगात्मक  प्रवृत्ति के कारण उनका बहुत सम्मान होता था।  एक दिन में छुट्टी के उपरांत विद्यालय से अपने घर जा रहे थे, रास्ते में एक सम्भ्रान्त घर का प्रोढ़ व्यक्ति मदिरा के नशे में बेहोश होकर नाली में पड़ा था। उसके शरीर को कुत्ते काट रहे थे।  हमने भी वह दृश्य देखा और कुछ हँसी, कुछ घृणा, कुछ निन्दा का भाव जगा।  समाधान कुछ हुआ नहीं। दिन गुजरा, रात बीती,  अगले दिन विद्यालय गए उन्ही गुरुजी का कालांश (पीरियड) आया।  उन्होंने दो शब्द प्रयोग किये,  वे शब्द आज भी उनकी उसी गम्भीरता और प्रेमरस से सराबोर ध्वनि में हृदय में संरक्षित हैं।  उन्होंने कहा था बच्चों!  हमें शिक्षा दो प्रकार से मिलती है 
1.  अच्छे इंसान के अच्छे कर्म से,  2. बुरे आदमी के बुरे कर्म से ।
पहली बात तो समझ में आ ही जाती है, परंतु दूसरी बात समझ में नहीं आती। भाई बुरा इंसान क्या शिक्षा देगा?  उससे क्या सीखे? बड़ा सीधा साधा सा ढंग उन्होंने बताया कि अच्छा इन्सान कुछ अच्छा कर्म करें तो हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम भी ऐसा ही अच्छे कर्म करें।  जब बुरा इन्सान कोई समाजविरोधी अनैतिक कार्य करें तो उसे देखकर घृणा न करो, निन्दा न करों, उपहास मत उड़ाओ,  अपितु उसको भी गुरु मानकर शिक्षा लो कि हम जीवन में ऐसा कार्य कदापि नहीं करेंगे।  बुरे इंसान से घृणा नहीं बल्कि बुराई से घृणा करो। जीवन में विविध रंग, विविध ढंग, विविध संग, विविध जंग के पल आते हैं, समझदार वही है, जो संतुलन बनाए रखता है। राग-द्वेष में, मित्र-शत्रु, में, लाभ-हानि में, जय-पराजय में, जन्म-मरण के संदेश में, सुख-दुःख में, सर्दी-गर्मी में, अनुकूलता-प्रतिकूलता में, यश-अपयश, में भवन-वन में, सुस्वादु-नीरस भोजन में ― कहाँ तक कहे, जीवन के प्रत्येक कदम पर संतुलन अपेक्षित है। संतुलन शब्द बहुत छोटा है, परंतु किसी एक शब्द से समग्र शास्त्रों का नैतिक तत्व, जीवन जीने की कला,  जीवन-दर्शन भरा हुआ है। जिसने सन्तुलन बना लिया, उसने जीवन बना लिया। किसी भी स्थिति में वह प्रौढ़ व्यक्ति बिखरता नहीं, तमाशा नहीं बनता।
 हम लोग अपने जीवन का बेशकीमती समय व्यर्थ की चर्चा, व्यर्थ की चिन्ता,  व्यर्थ के विवादों में गवाँ देते है,  जबकि हमको आत्मचिन्तन करके अपनी  स्थिति का आंकलन करना चाहिए कि मैं क्या हूँ? मेरी अच्छाई-बुराई क्या है?  मेरी शक्ति तथा  मेरी कमजोरी क्या है? तदनन्तर  उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए, जिससे कि हमें सफलताओं की प्राप्ति में सहजता हो।  जब जीवन सुनियोजित हो तब सफलताओं की संभावनाएं बढ़ जाती है।  हमको लगता है कि जगत् में जो कुछ भी है, अच्छा या बुरा सबसे  कुछ-न-कुछ सीखा जा सकता है। आप सोचो! क्या व्यभिचार-परायणा सवेच्छाचारिणी  कोई वेश्या भी कुछ शिक्षा दे सकती है?  नहीं न!  क्योंकि उसकी शिक्षा, उसके संस्कार, उसकी संगति तो हमको पतन की ओर ले जा सकती है, दुश्चरित्रता के दलदल में फंसा सकती है, यही बात है न ! परंतु भारतीय ऋषि-परम्परा के देदीप्यमान नक्षत्र, अद्वैतनिष्ठा  के प्रतिमान, साधुता की  कसौटी, परमानंद की मस्ती के समुद्र में सदा निमग्न  रहने वाले अत्रिनंदन दत्तात्रेय जी महाराज ने अपने जीवन में 24 गुरुओं की चर्चा की है।  आश्चर्य यह है कि ना तो उन्होंने किसी गुरु से दीक्षा ली और ना ही किसी गुरु को  दक्षिणा दी। दीक्षा और दक्षिणा की व्यवहारिक ओपचारिकताओं से रहित होकर उन 24 गुरुओं से   शिक्षा भी ली, उनको  गुरू भी माना, परन्तु उन गुरुओं खबर तक नहीं। 
(हम गुरुओं की नजर  में आना चाहते है, उनकी लिस्ट में नाम चाहते हैं, परंतु उनकी शिक्षाओं  पर नहीं चलते, यही विडंबना है)
 दत्तात्रेय जी ने कहा कि मैं एक बार भ्रमण करता हुआ मिथिला पहुंच गया, रात्रि के समय बाजार में एक स्थान पर विश्राम हेतु  बैठ गया।  सारी दुनियां चैन की नींद सो रही थी। वहीं पर एक सुंदर से भवन में श्रृंगार करके एक सुंदरी आने-जाने वालों को देखती, बार-बार अंदर जाती, बाहर आती।  बेचैनी में जागते हुये पूरी रात गुजर गई,  परंतु कोई ग्राहक नहीं आया । मैंने पता किया तो जाना कि यह सर्वोत्तमा सुंदरी मिथिला की वेश्या पिंगला है। प्रातःकाल 4 बजे मंदिरों की घंटियां बज उठी। शंख की मांगलिक ध्वनि से दिशाएँ  गूँजने लगी। मंत्रोच्चारण तथा प्रार्थनाओं के प्यारे स्वर हवा के साथ तैरते हुए दूर तक अठखेलियाँ करने लगे और उधर पिंगला ने श्रृंगार फेंक दिया,  बेचैनी और निराशा की जगह मुखमण्डल पर प्रसन्नतामिश्रित सोम्यता,  निश्चिन्तता, शांति की प्रभा ने अड्डा जमा लिया।  सहसा पिंगला बोल उठी―छिः-छिः,  मेरा सारा जीवन नश्वर संसार के, नश्वर भोगों की पूर्ति के लिए, नश्वर प्राणियों की ओर आशा भरी नजरों से निहारते बीत गया।  मैंने कभी अपने अंतर्मन में बैठे प्राणधन प्रियतम की ओर देखा तक नहीं। हे अभागिन पिंगले!  तू जाग जा, वासना की  गंदी नाली को छोड़ उपासना की गंगा में अवगाहन कर । अब लौं नसानी अब ना नैसेहौं ― अब तक जीवन व्यर्थ गया, अब एक पल भी व्यर्थ नहीं करना।  संसार की आशा दुख देती है और संसार से निराश होने में ही सुख है।
 आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
पिंगला वेश्या की इस बात को सुनकर दत्तात्रेय जी ने पिंगला को मन ही मन नमन करके गुरु मान लिया और मन में ठान लिया कि अब किसी से आशा या अपेक्षा नहीं करना,  क्योंकि अपेक्षा ही उपेक्षा कराती है। आप किसी से अपेक्षा ना करो तो कोई उपेक्षा कर ही नहीं सकता। सन्त ने वेश्य से भी कुछ सीख लिया और एक हम हैं कि सन्तों से भी कुछ सीखने को तैयार नहीं। 
 पूरा जगत हमारा गुरू है, हमें सावधानी पूर्वक अच्छाई-बुराई का निर्धारण करके जीवन पावन बनाना है।
साभार―गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के जून 2021 के अंक से

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

धृतराष्ट्र का युधिष्ठिर के प्रति वचन

नाहं तथा ह्यर्जुनाद् वासुदेवाद्,
भीमाद् वाहं यमयोर्वा विभेमि।।
यथा राज्ञ क्रोधदीप्तस्य सूत
 मन्ययोरहं भीततरः सदैवः।
महातपा ब्रह्मचर्येण युक्तः
संकल्पोsयं मानसस्तस्य सिद्धयेत्।।
(महाभारत उद्योगपर्व)
संजय! मैं अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन, तथा नकुल-सहदेव से भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोध से तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिर के कोप से । उनके रोष से  मैं सदा ही अत्यंत भयभीत रहता हुँ; क्योंकि वें महान तपस्वी और ब्रह्मचर्य से संपन्न हैं; इसलिए उनके मन में जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
(महाराज धृतराष्ट्र संजय से)

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों के सोलह भेद (परम पूज्य गुरुदेव समर्थश्री जी)

परम पूज्य गुरूदेव समर्थश्री जी
ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों के सोलह भेद...
{अथातश्चत्वार आश्रमाः तेषाञ्च षोडषभेदा भवन्ति}
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ब्रह्मचारी के चार भेद=

1-गायत्रः{उपकुर्वाण}= 
उपनयन संस्कारानन्तर त्रिरात्रपर्यंत लवणरहित आहार कर गायत्री जपासक्त रहने वाले ब्रह्मचारी को गायत्र कहा जाता है।

2-ब्राह्मणः=
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक {प्रत्येक वेदाध्ययन् हेतु 12×4=48वर्ष के योग से} वेदाध्ययन करने वाला ब्रह्मचारी ब्राह्मण कहलाता है। अथवा 24 वर्ष तक गुरुकुलवासी ब्राह्मण कहाता है।

3-प्राजापत्यः
48 वर्ष तक गुरुकुलवास करने पर प्राजापत्य संज्ञा होती है।अथवा केवल स्वदार में ही निरत, केवल शास्त्राज्ञानुरूप विहित तिथि में ही ऋतुकालाभिगामी तथा सर्वदा सर्वथा परदारवर्जी को प्राजापत्य ब्रह्मचारी कहा जाता है।

4-बृहन् {नैष्ठिकः}=
आजीवन गुरुकुल की मर्यादा में रहकर निजाश्रमोचित शास्त्रीयानुशासन को मानने वाले नैष्ठिक अथवा बृहन् कहे जाते हैं।
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गृहस्थी के चारभेद...

1-वार्ताकवृत्तयः=
कृषि गोरक्षा तथा अगर्हित अनिन्दित {शास्त्रनिषेधमुक्त}व्यापार द्वारा न्यायोचित अर्थाजन से स्वाहा स्वधा तथा पंचमहायज्ञादि पूर्वक आत्मकल्याण में प्रवृत्त सदाचारी गृहस्थ को वार्ताकवृत्ति कहा जाता है।

2-शालीनवृत्तयः=
जो वेदाध्ययन् करके वृत्यर्थ पढाते नहीं।स्वयं यजमान बनकर यजन तो करते हैं परन्तु आचार्य बनकर यजन नहीं कराते।
यथाशक्ति नित्य दान तो करते हैं परन्तु प्रतिग्रह{दान}नहीं लेते।निरन्तर परमार्थ साधन में लगे रहते हैं।

3-यायावराः=पर्यटनशीलाः
जो पठन पाठन यजन याजन दान प्रतिग्रह आदि षट्कर्म करके आत्मज्ञान हेतु साधनरत रहते हैं।

4-घोरसंन्यासिकाः= सर्वथा संग्रह परिग्रह प्रतिग्रहशून्य अश्वस्तनिक कल की चिन्ता न करने वाले साधक दम्पती,
जो जल तक की शुद्धता का विशेषविचार कर पवित्रजल से क्रिया सम्पादन कर,प्रतिदिवसीय उञ्छवृत्ति से संकलित धान्य द्वारा जीवन निर्वाह कर आत्मज्ञान में निरत होते हैं।
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वानप्रस्थी के चार भेद...

1-वैखानसाः=विखनसं ब्रह्माणं वेत्ति तपसा
वनक्षेत्र में समुत्पन्न{अग्रामोद्भूत}अकृष्टपच्य अहल्यभूम्युत्पन्न{बिना हल चलाये ही उपजे हुए अन्न}औषधि वनस्पति आदि द्वारा पञ्चयज्ञादि सम्पन्न कर आत्मकल्याण में निरत वानप्रस्थी को बैखानस कहा जाता है।

2-उदुम्बराः= औदुम्बरेण जीवन्तीति

प्रातः जगते ही जिस दिशा में भाव बने चल पडे और दैनिककृत्य सम्पन्न कर वहां से गूलर बेर नीवार सामकादि साधन लाकर अग्निचर्या पूर्ण कर पंचमहायज्ञ करके,आत्मकल्याण में लगे रहने वाले औदुम्बर होते हैं।

3-बालखिल्याः=प्राणोपमाःतपसि निरताः अतिसूक्ष्माः ब्रह्मणो रोमेभ्योत्पन्ना वा

जटा चीर मृगचर्म वल्कल {वृक्षत्वक्}धारी आषाढ पूर्णिमा से कार्तिकपूर्णिमा {चातुर्मास} तक फलमूलाशी होकर रहने वाले,शेष आठ मास तक वृत्युपार्जन करके पंचमहायज्ञादि करते हुए आत्मकल्याण साधन करने वाले बालखिल्य कहे जाते हैं।

4-फेनपाः=फेनं पिबन्तीति अल्पाहारसूक्ष्माहारसेविनः

उन्मत्तवत् सूखे गिरे हुए पत्ते फलादि खाते हुए,यत्रकुत्रापि एकान्तवास करते यथासंभव पंचमहायज्ञ करते हुए अग्निचर्या सम्पन्न करके आत्मकल्याण में निरत फेनप कहे जाते हैं।
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सन्यासी के चार भेद...

1-कुटीचराः=कुट्यां चकते/चरते वा इति कुटीचकः

 स्वजनों के द्वारा प्राप्त भिक्षा से प्रसन्न निश्चित कुटिया में रहकर आत्मानुसंधानरत संन्यासी को कुटीचक कहा जाता है।

2-बहूदकाः= बहूनि उदकानि शौचांगतया यस्य सः ते

त्रिदण्डी कमण्डलु छींका जल कुशा पादुका आसन शिखा सूत्र कौपीन काषायवेषधारी,विप्रकुलात भिक्षाव्रती, आत्मानुसन्धानकर्ता संन्यासी  बहूदक कहाते हैं।

3-हंसाः= नीरक्षीरविवेकीहंसवत् नित्यानित्यवस्तुविवेकशीलाः

एकदण्डी सूत्रशिखारहित {शिखावर्जिताs यज्ञोपवीतधारिणः} कमण्डलुधर,ग्राम में एकरात्रि मात्र रहने वाले,नगर या तीर्थ में पंचरात्र रहने वाले,निरंतर एकरात्रव्रत द्विरात्र व्रत कृच्छ्रव्रत अथवा चांद्रायणादि करते रहने वाले,आत्मानुशीलनरत संन्यासी हंस कहे जाते हैं।

4-परमहंसाः=हंसेभ्योपि पराः इति
अव्यक्तलिङ्गा दण्डादिरहित चंदन माला उपासनापद्धति वस्त्रादि से भी ज्ञात न होने वाले आचार विचार सम्पन्न शून्यागार देवागार निवासी धर्माधर्ममुक्त विधिनिषेध से पार समलोष्टाश्मकांचन सर्वत्र भिक्षाचारी ब्रह्मवित् महात्मा परमहंस कहे जाते हैं।

स्रोत..आश्रमोपनिषत्..
परम पूज्य गुरूदेव
समर्थ श्री जी

बुधवार, 1 सितंबर 2021

धर्म की जय हो!


धर्म की जय हो!

धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज की जय हो!
 
गुरूदेव श्री समर्थ श्री जी महाराज की जय हो! 

नमःपार्वतीपतये हर-हर महादेव!

धर्मसंदेश ब्लॉग का उद्देश्य सनातन धर्मियो को अपने सनातन धर्म से जोडे रखना है। सनातन धर्म कें आधारभूत धर्मशास्त्र, वेद-पुराण आदि में वर्णित धार्मिक संदेश, नित्य पूजन, सनातनी जीवन शैली, व्रत, तिथि, त्यौहार, सनातनी रीति-रिवाजों के विषय में अवगत कराना और स्वधर्म के प्रति निष्ठावृद्धि की कामना से धर्म संदेश ब्लॉग को गठित किया गया है।

त्योहार कैसे मनाना चाहिए ,क्यों मनाना चाहिए, त्यौहार को मनाने की सही विधि क्या है यह सब हम ब्लॉग के माध्यम से आप तक पहुंचाते रहते हैं। ज्योतिष,आदि की जानकारी के लिए आप इस ब्लॉग को देख सकते हैं।
 
यदि आपके मन में भी सनातन धर्म से संबंधित कोई भी प्रश्न हो अथवा आपकी कौई व्यक्तिगत समस्या हो; आप संदेश लिख सकते है, यथासमय धार्मिक एवं ज्योतिषीय उपाय बताने का हमारा प्रयास रहेगा। प्रश्नकर्ता गोपनीय रहेगा।

सधन्यवाद,
आचार्य रोहित वशिष्ठ
संपर्क - 9690066000
ईमेल - 108rohitg@gmail.com